कोऽर्थ: पुत्रेण जातना
यो न विद्वान न धर्मिक:
काणेन चक्षुषा की वा
चक्षु: पीड़ैव केवलम्
"ऐसे पुत्र का क्या लाभ जो न तो विद्वान है और न ही धार्मिक है? ऐसा पुत्र एक अंधे, रोगग्रस्त नेत्र के समान है, जो हमेशा पीड़ा का कारण बनता है।" फिर भी, भौतिक दुनिया इतनी प्रदूषित है कि व्यक्ति एक पुत्र चाहता है, भले ही वह बेकार हो। यह दृष्टिकोण राजा चित्रकेतु के इतिहास में दर्शाया गया था।
