श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 14: राजा चित्रकेतु का शोक  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  6.14.29 
अथाह नृपतिं राजन् भवितैकस्तवात्मज: ।
हर्षशोकप्रदस्तुभ्यमिति ब्रह्मसुतो ययौ ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद महान ऋषि ने राजा से कहा- "हे महाराज, अब तुम्हारे एक पुत्र होगा जो हर्ष और शोक दोनों का कारण बनेगा।" ऐसा कहकर चित्रकेतु के जवाब की प्रतीक्षा किए बिना ऋषि वहाँ से चले गए।
 
Thereafter the sage said to the king, "O King! Now you will have a son who will be the cause of both joy and sorrow." Saying this, the sage left without waiting for Chitraketu's reply.
तात्पर्य
हर्ष शब्द का अर्थ है "उल्लास", शोक शब्द का अर्थ है "विलाप"। राजा खुशी से अभिभूत था जब उसे पता चला कि उसके एक पुत्र होगा। अपने महान उल्लास के कारण, वह वास्तव में ऋषि अंगिरा के कथन को समझ नहीं पाया। उसने इसे इस अर्थ में स्वीकार किया कि उसके भावी पुत्र के जन्म के कारण निश्चित रूप से उल्लास होगा, लेकिन वह राजा का एकमात्र पुत्र होगा और अपनी विशाल संपत्ति और साम्राज्य पर बहुत गर्व होने के कारण, वह अपने पिता का बहुत आज्ञाकारी नहीं होगा। इस प्रकार राजा संतुष्ट था, यह सोचकर, "एक पुत्र हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह बहुत आज्ञाकारी है या नहीं।" बंगाल में एक कहावत है कि कोई मामा न होने के बजाय अंधा मामा होना बेहतर है। राजा ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए सोचा कि एक अवज्ञाकारी पुत्र बिल्कुल भी पुत्र न होने से बेहतर होगा। महान ऋषि चाणक्य पंडित कहते हैं:

कोऽर्थ: पुत्रेण जातना

यो न विद्वान न धर्मिक:

काणेन चक्षुषा की वा

चक्षु: पीड़ैव केवलम्

"ऐसे पुत्र का क्या लाभ जो न तो विद्वान है और न ही धार्मिक है? ऐसा पुत्र एक अंधे, रोगग्रस्त नेत्र के समान है, जो हमेशा पीड़ा का कारण बनता है।" फिर भी, भौतिक दुनिया इतनी प्रदूषित है कि व्यक्ति एक पुत्र चाहता है, भले ही वह बेकार हो। यह दृष्टिकोण राजा चित्रकेतु के इतिहास में दर्शाया गया था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)