श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 14: राजा चित्रकेतु का शोक  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  6.14.12 
रूपौदार्यवयोजन्मविद्यैश्वर्यश्रियादिभि: ।
सम्पन्नस्य गुणै: सर्वैश्चिन्ता बन्ध्यापतेरभूत् ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
चित्रकेतु, इन करोड़ों पत्नियों का पति एक बहुत सुंदर, उदार और जवान व्यक्ति था। वह एक उच्च कुलीन परिवार में जन्मा था, उसे पूरी शिक्षा मिली थी और वह बहुत धनी और ऐश्वर्यशाली था। फिर भी, इन सभी गुणों के होते हुए भी, उसे एक पुत्र न होने का बहुत दुख था और वह हमेशा चिंतित रहता था।
 
Chitraketu, the husband of these one million wives, was very handsome, generous and young. He was born in a high family, had received full education and was wealthy and prosperous. Yet despite having all these qualities, he was very worried because he did not have a son.
तात्पर्य
ऐसा लगता है कि राजा ने सबसे पहले एक पत्नी से शादी की, लेकिन वह बच्चा पैदा नहीं कर सकी। फिर उसने दूसरी, तीसरी, चौथी और इसी तरह से शादी की, लेकिन कोई भी पत्नी बच्चे को जन्म नहीं दे सकी। जन्मैश्वर्य-श्रुत-श्री की भौतिक संपत्ति के बावजूद - एक कुलीन परिवार में जन्म लेना जिसमें पूरी शोभा, धन, शिक्षा और सुंदरता थी - वह बहुत दुखी थे क्योंकि इतनी पत्नियां होने के बावजूद, उनका कोई बेटा नहीं था। निश्चित रूप से उनका दुख स्वाभाविक था। गृहस्थ जीवन का मतलब केवल एक पत्नी होना और बच्चे न होना नहीं है। चाणक्य पंडित कहते हैं, पुत्र-हीनं गृहं शून्यम: यदि एक गृहस्थ व्यक्ति का कोई पुत्र नहीं है, तो उसका घर मरुस्थल से बेहतर नहीं है। राजा निश्चित रूप से सबसे दुखी था कि उसे पुत्र नहीं मिल सका, और यही कारण है कि उसने इतनी बार विवाह किया। क्षत्रियों को विशेष रूप से एक से अधिक पत्नियों से शादी करने की अनुमति है, और इस राजा ने ऐसा किया। फिर भी, उसकी कोई संतान नहीं थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)