"ईशावास्यमिदं सर्वं
यत्किंच जगत्यां जगत्
त एन त्यक्तेन भुञ्जीथा
मा गृधः कस्य स्विद् धनम"
"इस संसार में जो कुछ भी चेतन या अचेतन है, वह परमेश्वर के द्वारा अधीन और स्वामी है। इसलिए मनुष्य को केवल उन्हीं चीजों को स्वीकार करना चाहिए जो उसके लिए आवश्यक हैं, जो उसके कोटे के रूप में अलग रखी गई हैं, और उसे अन्य चीजों को स्वीकार नहीं करना चाहिए, यह अच्छी तरह से जानते हुए कि वे किसके हैं।" सर्वोच्च नियंत्रक कृष्ण ने भौतिक जगत की रचना की है, जो पूरी तरह से परिपूर्ण और अभाव से मुक्त है। परमेश्वर सभी जीवित संस्थाओं की आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है। ये आवश्यकताएं पृथ्वी से आती हैं, और इस प्रकार पृथ्वी आपूर्ति का स्रोत है। जब एक अच्छा शासक होता है, तो वह स्रोत जीवन की आवश्यकताओं का बहुतायत से उत्पादन करता है। हालाँकि, जब ऐसा अच्छा शासक नहीं होता है, तो कमी होगी। कामधुक शब्द का यही अर्थ है। श्रीमद-भागवतम (1.10.4) में कहीं और कहा गया है, "कामं ववर्ष परजन्यः सर्व-काम-दुधा महि:" "महाराज युधिष्ठिर के शासनकाल में, बादलों ने पानी की पूरी बारिश की जिसकी लोगों को जरूरत थी, और पृथ्वी ने बड़ी मात्रा में मनुष्यों की सभी जरूरतों को पूरा किया।" हमारे पास यह अनुभव है कि कुछ मौसमों में बारिश प्रचुर होती है और अन्य मौसमों में कमी होती है। पृथ्वी की उत्पादकता पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है, क्योंकि यह स्वाभाविक रूप से परम व्यक्तित्व भगवान के पूर्ण नियंत्रण में है। उनके आदेश से, भगवान पृथ्वी को पर्याप्त या अपर्याप्त रूप से उत्पादन करा सकते हैं। यदि कोई धर्मनिष्ठ राजा शास्त्रीय आज्ञाओं के अनुसार पृथ्वी पर शासन करता है, तो स्वाभाविक रूप से नियमित वर्षा होगी और सभी मनुष्यों के लिए पर्याप्त उत्पादन होगा। शोषण का कोई सवाल नहीं होगा, क्योंकि सबके पास पर्याप्त होगा। कालाबाजारी और अन्य भ्रष्ट व्यवहार तब अपने आप रुक जाएँगे। केवल भूमि पर शासन करना मनुष्य की समस्याओं को हल नहीं कर सकता जब तक कि नेता में आध्यात्मिक क्षमताएँ न हों। उसे महाराज युधिष्ठिर, परीक्षित महाराज या रामचंद्र जैसा होना चाहिए। तब देश के सभी निवासी अत्यंत प्रसन्न रहेंगे।
