श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 12: वृत्रासुर की यशस्वी मृत्यु  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  6.12.22 
यस्य भक्तिर्भगवति हरौ नि:श्रेयसेश्वरे ।
विक्रीडतोऽमृताम्भोधौ किं क्षुद्रै: खातकोदकै: ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य परम कल्याणकारी परमात्मा हरि की भक्ति में स्थिर रहता है, वह अमृत के समुद्र में तैर रहा है। उसके लिए छोटे-छोटे गड्ढों के पानी का क्या महत्व?
 
The man who is steadfast in devotion to the supreme benefactor, Lord Hari, swims in the ocean of nectar. What use is the water of small ditches to him?
तात्पर्य
वृत्रासुर ने पहले प्रार्थना की (भागवत. 6.11.25), न नक-पृष्ठं न च परमेष्ठ्यं न सर्वभौमं न रसाधि-पत्यम। "मुझे ब्रह्मलोक, स्वर्गलोक या ध्रुवलोक पर सुख-सुविधाओं की आवश्यकता नहीं है। इस धरती या निचले ग्रहों की बात तो जाने दो। मैं बस अपने घर, भगवान के पास वापस लौटना चाहता हूँ।" यही एक विशुद्ध भक्त का संकल्प होता है। एक शुद्ध भक्त इस भौतिक दुनिया के किसी भी उत्कृष्ट पद से कभी आकर्षित नहीं होता। वह बस श्रीमती राधारानी, गोपियों, कृष्ण के माता-पिता (नंद महाराज और यशोदा), कृष्ण के मित्रों और कृष्ण के सेवकों की तरह ही भगवान की सर्वोच्च विभूति के साथ जुड़ना चाहता है। वह कृष्ण के वृंदावन की सुंदरता के वातावरण के साथ जुड़ना चाहता है। ये कृष्ण के एक भक्त की सबसे बड़ी आकांक्षाएँ होती हैं। भगवान विष्णु के भक्त वैकुण्ठलोक में एक पद की आकांक्षा कर सकते हैं, लेकिन कृष्ण के एक भक्त वैकुण्ठ की सुविधाओं की भी कभी आकांक्षा नहीं करते; वह गोलोक वृंदावन लौटना और अपने नित्य-लीलाओं में भगवान कृष्ण के साथ जुड़ना चाहते हैं। कोई भी भौतिक सुख खाई में पानी के समान होता है, जबकि आध्यात्मिक दुनिया में नित्य आनंद एक अमृत का महासागर है जिसमें एक भक्त तैरना चाहता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)