श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 12: वृत्रासुर की यशस्वी मृत्यु  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  6.12.21 
खल्विदं महदाश्चर्यं यद् रज:प्रकृतेस्तव ।
वासुदेवे भगवति सत्त्वात्मनि दृढा मति: ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
हे वृत्रासुर! असुर प्राय: रजोगुणी प्रकृति के होते हैं, अतः यह कितना बड़ा आश्चर्य है! कहा जाएगा कि असुर होकर भी तूने भक्त का भाव ग्रहण करके अपने चित्त को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान वासुदेव में स्थिर कर रखा है, जो सदैव शुद्ध सत्त्वगुण में स्थित रहते हैं!
 
O Vṛtrāsura! Demons are generally in the mode of passion, so this is a great wonder. It will be said that even though you are a demon, you have adopted the devotional attitude and fixed your mind on the Supreme Personality of Godhead, Vasudeva, who is always situated in pure Sattva.
तात्पर्य
अन्तरिक्ष देव राजा इन्द्र को यह आश्चर्य हो रहा था कि वृत्रासुर किस प्रकार एक उच्चकोटि के भक्त बनने में सक्षम हो गया है। जैसा कि प्रह्लाद महाराजा के मामले में, उन्हें नारद मुनि द्वारा दीक्षित किया गया था, और इसलिए उनके लिए एक महान भक्त बनना सम्भव था, यद्यपि उनका जन्म राक्षसों के एक परिवार में हुआ था। हालाँकि वृत्रासुर के मामले में, इन्द्र ऐसे किसी कारण का पता नहीं लगा सकते थे। इसलिए वह आश्चर्यचकित हो गए थे कि वृत्रासुर इतना उच्चकोटि का भक्त था कि वह बिना विचलित हुए भगवान कृष्ण, वासुदेव के चरण कमलों पर अपना मन लगा सकता था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)