श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 12: वृत्रासुर की यशस्वी मृत्यु  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  6.12.2 
ततो युगान्ताग्निकठोरजिह्व-
माविध्य शूलं तरसासुरेन्द्र: ।
क्षिप्त्वा महेन्द्राय विनद्य वीरो
हतोऽसि पापेति रुषा जगाद ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
तब असुरों का महान् योद्धा वृत्रासुर ने अपने शूल की नोक को घुमाया, जिसके सिरे हज़ारों वर्षों के अंत में प्रज्ज्वलित होने वाली आग की लपटों के समान तीखी थी। उसने बड़े बल और क्रोध के साथ उसे इन्द्र पर चलाया और गरजते हुए बड़े जोर से कहा, "ऐ पापी, इस प्रकार मैं तुम्हें मार डालूँगा!"
 
Then Vritraasura, the greatest warrior amongst the demons, threw his trident with sharp tips like the blazing fire of the end of the Kalpa (doomsday) at Indra with great anger and speed. He roared and said, “Oh sinner, I will kill you.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)