त्रैवर्गिकायासविघातमस्मत्-
पतिर्विधत्ते पुरुषस्य शक्र ।
ततोऽनुमेयो भगवत्प्रसादो
यो दुर्लभोऽकिञ्चनगोचरोऽन्यै: ॥ २३ ॥
अनुवाद
हमारे भगवान् अपने भक्तों को धर्म, अर्थ और काम (इन्द्रिय-तृप्ति) के लिए व्यर्थ प्रयास करने से मना करते हैं। हे इन्द्र! इससे समझा जा सकता है कि भगवान् कितने दयालु हैं। ऐसी दया केवल उन्हीं भक्तों को मिलती है जो निस्वार्थ हैं, न कि उन लोगों को मिलती है जो भौतिक लाभ चाहते हैं।
Our Lord forbids His devotees from making futile efforts for Dharma, Artha and Kama (sensuous gratification). O Indra! From this one can guess how merciful the Lord is. Such mercy is attainable only to pure devotees, not to persons seeking material gain.
तात्पर्य
मानव जीवन के चार उद्देश्य होते हैं -- धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष। मनुष्य सामान्यतः धर्म, अर्थ एवं काम की कामना करता है; किन्तु परम् भक्त को तो इस जीवन एवं अगले जीवन में केवल परमेश्वर की सेवा करने की इच्छा रहती है। अकृत्रिम भक्त पर प्रभु की विशेष कृपा होती है और प्रभु उसे धर्म, अर्थ एवं काम के फल प्राप्त करने के लिए परिश्रम करने से बचा लेते हैं। अवश्य ही यदि उसे इस प्रकार के लाभ चाहिए, तो प्रभु उसे प्रदान करते भी हैं। विशेष उदाहरण के लिए, इंद्र भक्त तो थे, किन्तु भौतिक बंधन से मुक्त होने की उनमें कोई विशेष रुचि नहीं थी। वे स्वर्गलोक में भोग विलास एवं सुखोपभोग चाहते थे। इसके विपरीत व-त्रासुर परम भक्त थे; वे तो केवल परमेश्वर की सेवा करना चाहते थे। इसीलिए प्रभु ने ऐसा आयोजन किया कि इन्द्र से शारीरिक बंधन का विनाश होने पर व-त्रासुर भगवान के पास वापिस चले जाएँ। व-त्रासुर ने इन्द्र से निवेदन किया कि वे शीघ्र ही उन पर अपने वज्र का प्रयोग करें, जिससे उनकी एवं इन्द्र की भक्ति भावना के विकास के अनुरूप दोनों को लाभ हो।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥