श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 11: वृत्रासुर के दिव्य गुण  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  6.11.16 
श्रीह्रीदयाकीर्तिभिरुज्झितं त्वां
स्वकर्मणा पुरुषादैश्च गर्ह्यम् ।
कृच्छ्रेण मच्छूलविभिन्नदेह-
मस्पृष्टवह्निं समदन्ति गृध्रा: ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
हे इन्द्र! तू हर तरह की लज्जा, दया, यश तथा ऐश्वर्य से खाली है। अपने स्वार्थपरक कर्मों के फल से इन सद्गुणों से रहित होकर तू राक्षसों द्वारा भी निंदायोग्य है। अब मैं अपने त्रिशूल से तेरे शरीर को बेध डालूँगा और जब तू भयंकर कष्ट से मरेगा तो अग्नि भी तेरे शरीर को स्पर्श नहीं करेगी, केवल गिद्ध ही तेरे शरीर को खायेंगे।
 
O Indra! You are devoid of all modesty, kindness, fame and prosperity. Devoid of these virtues due to the result of your selfish actions, you are also condemnable by the demons. Now I will pierce your body with my trident and when you die in great pain, even the fire will not touch you, only the vultures will eat your body.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)