सर्व-योनिषु कौन्तेय
मूर्ति ही साम्भवन्ति याः
तासां ब्रह्म महद्योनि
अहं बीज-प्रदः पिता
"यह समझा जाना चाहिए कि सभी प्रजातियों के जीवन, हे अर्जुन, इस भौतिक प्रकृति में जन्म द्वारा संभव है और मैं बीज देने वाला पिता हूं।" इन जीवों के विभिन्न रूप केवल उनके बाहरी लिबास हैं। वास्तव में, हर प्राणी एक आत्मा है, जो ईश्वर का एक अभिन्न अंग है। इसलिए किसी को केवल एक प्रकार के जीव का ही पक्ष नहीं लेना चाहिए। एक वैष्णव सभी जीवों को ईश्वर का अभिन्न अंग देखता है। जैसा कि भगवान ने भगवद-गीता (5.18 और 18.54) में कहा है:
विद्या-विनय-संपन्ने
ब्राह्मणे गवि हस्तिनी
शुनी चैव श्वपाके च
पंडितः सम-दर्शिनः
"सच्चे ज्ञान के गुण से, विनम्र संत एक विद्वान और सौम्य ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और कुत्ते को खाने वाले [अछूत] सभी को एक समान नज़र से देखता है।"
ब्रह्म-भूतः प्रसन्नआत्मा
न शोचति न कांक्षति
समः सर्वेषु भूतेषु
मद्-भक्तिं लभते परां
"जो व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से पूर्ण है, वह तुरंत परम ब्रह्म का एहसास करता है और पूरी तरह से आनंदित हो जाता है। उसे कभी कोई अफ़सोस नहीं होता है या वह कभी कुछ चाहत नहीं रखता; वह हर जीव के प्रति समान रूप से प्रसन्न रहता है। उस अवस्था में वह मेरी शुद्ध भक्ति प्राप्त करता है।" इसलिए एक वैष्णव निःसंदेह एक पूर्ण व्यक्ति है क्योंकि वह दूसरों को दुखी देखकर दुखी होता है और दूसरों को सुखी देखकर आनंद महसूस करता है। एक वैष्णव पर-दुःख-दुखी होता है; वह परिस्थितिजन्य आत्माओं को भौतिकवाद की दुखद स्थिति में देखकर हमेशा दुखी रहता है। इसलिए, एक वैष्णव हमेशा पूरी दुनिया में कृष्ण चेतना का प्रचार करने में व्यस्त रहता है।
