श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 10: देवताओं तथा वृत्रासुर के मध्य युद्ध  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  6.10.9 
एतावानव्ययो धर्म: पुण्यश्लोकैरुपासित: ।
यो भूतशोकहर्षाभ्यामात्मा शोचति हृष्यति ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई व्यक्ति दूसरे जीवों के दुखों से दुखी होता है और उनकी ख़ुशी देखकर ख़ुश होता है, तो ऐसे धार्मिक सिद्धांतों को पवित्र और परोपकारी महापुरुषों द्वारा अविनाशी माना जाता है।
 
If a man feels sad at the suffering of other beings and feels happy at their happiness, then the religion of such a man has been considered to be indestructible by holy and altruistic great men.
तात्पर्य
आमतौर पर व्यक्ति भौतिक प्रकृति के प्रकारों द्वारा दिये गए शरीर के अनुसार ही विभिन्न प्रकार के धार्मिक सिद्धांतों का पालन करता है या कई प्रकार के व्यावसायिक कर्तव्यों का पालन करता है। हालाँकि, इस श्लोक में, वास्तविक धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या की गई है। हर किसी को दूसरों के दुःख में दुखी और दूसरे के सुख में सुखी होना चाहिए। आत्मवत सर्व-भूतेषु: व्यक्ति को दूसरों का सुख-दुख अपने सुख-दुख की तरह महसूस करना चाहिए। यही आधार है कि बौद्ध धर्म के अहिंसा के सिद्धांत -- अहिंसा परम धर्मः -- की स्थापना हुई है। जब कोई व्यक्ति हमें परेशान करता है, तब हमें दर्द महसूस होता है और इसलिए हमें अन्य जीवों को तकलीफ नहीं पहुँचाना चाहिए। भगवान बुद्ध का मिशन अनावश्यक रूप से जानवरों की हत्या को रोकना था और इसलिए उन्होंने उपदेश दिया कि सबसे बड़ा धार्मिक सिद्धांत अहिंसा है। कोई भी जानवरों की हत्या नहीं कर सकता है और उसी समय एक धार्मिक व्यक्ति भी हो सकता है। यह सबसे बड़ा पाखंड है। जीसस क्राइस्ट ने कहा है, "हत्या मत करो," लेकिन पाखंडी हज़ारों वधशालाओं का रखरखाव करते हैं जबकि वे स्वयं को ईसाई कहते हैं। इस श्लोक में ऐसे पाखंड की निंदा की गई है। व्यक्ति को दूसरों के सुख में सुखी होना चाहिए और उसे दूसरों के दुख में दुखी होना चाहिए। यही सिद्धांत है जिसका पालन करना चाहिए। दुर्भाग्य से, वर्तमान समय में तथाकथित परोपकारी और मानवतावादी गरीब जानवरों के जीवन की कीमत पर मानवता की खुशी की वकालत करते हैं। यहाँ इसकी सिफारिश नहीं की जाती है। यह श्लोक स्पष्ट रूप से कहता है कि व्यक्ति को सभी जीवों पर दयालु होना चाहिए। चाहे वह इंसान हो, जानवर हो, पेड़ हो या पौधा, सभी जीव ईश्वर के पुत्र हैं। भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (14.4) में कहा है:

सर्व-योनिषु कौन्तेय

मूर्ति ही साम्भवन्ति याः

तासां ब्रह्म महद्योनि

अहं बीज-प्रदः पिता

"यह समझा जाना चाहिए कि सभी प्रजातियों के जीवन, हे अर्जुन, इस भौतिक प्रकृति में जन्म द्वारा संभव है और मैं बीज देने वाला पिता हूं।" इन जीवों के विभिन्न रूप केवल उनके बाहरी लिबास हैं। वास्तव में, हर प्राणी एक आत्मा है, जो ईश्वर का एक अभिन्न अंग है। इसलिए किसी को केवल एक प्रकार के जीव का ही पक्ष नहीं लेना चाहिए। एक वैष्णव सभी जीवों को ईश्वर का अभिन्न अंग देखता है। जैसा कि भगवान ने भगवद-गीता (5.18 और 18.54) में कहा है:

विद्या-विनय-संपन्ने

ब्राह्मणे गवि हस्तिनी

शुनी चैव श्वपाके च

पंडितः सम-दर्शिनः

"सच्चे ज्ञान के गुण से, विनम्र संत एक विद्वान और सौम्य ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और कुत्ते को खाने वाले [अछूत] सभी को एक समान नज़र से देखता है।"

ब्रह्म-भूतः प्रसन्नआत्मा

न शोचति न कांक्षति

समः सर्वेषु भूतेषु

मद्-भक्तिं लभते परां

"जो व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से पूर्ण है, वह तुरंत परम ब्रह्म का एहसास करता है और पूरी तरह से आनंदित हो जाता है। उसे कभी कोई अफ़सोस नहीं होता है या वह कभी कुछ चाहत नहीं रखता; वह हर जीव के प्रति समान रूप से प्रसन्न रहता है। उस अवस्था में वह मेरी शुद्ध भक्ति प्राप्त करता है।" इसलिए एक वैष्णव निःसंदेह एक पूर्ण व्यक्ति है क्योंकि वह दूसरों को दुखी देखकर दुखी होता है और दूसरों को सुखी देखकर आनंद महसूस करता है। एक वैष्णव पर-दुःख-दुखी होता है; वह परिस्थितिजन्य आत्माओं को भौतिकवाद की दुखद स्थिति में देखकर हमेशा दुखी रहता है। इसलिए, एक वैष्णव हमेशा पूरी दुनिया में कृष्ण चेतना का प्रचार करने में व्यस्त रहता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)