श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 10: देवताओं तथा वृत्रासुर के मध्य युद्ध  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  6.10.32 
जातस्य मृत्युर्ध्रुव एव सर्वत:
प्रतिक्रिया यस्य न चेह क्लृप्ता ।
लोको यशश्चाथ ततो यदि ह्यमुं
को नाम मृत्युं न वृणीत युक्तम् ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
वृत्रासुर ने कहा- इस संसार में जन्मे जीवों का मरना निश्चित है, क्योंकि आज तक कोई भी मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं ढूँढ पाया है। देवता तक इससे बचने का कोई उपाय नहीं बता सके। ऐसी स्थिति में जब मृत्यु को टाला नहीं जा सकता और स्वर्गलोक की प्राप्ति हो सकती है, तो उपयुक्त मृत्यु के कारण हमेशा यश और कीर्ति बनी रहेगी, तो कौन ऐसा व्यक्ति होगा, जो ऐसी यशस्वी मृत्यु को स्वीकार नहीं करेगा?
 
Vritrasur said—All living beings born in this world have to die. Certainly, no one in this world has been able to find any way to avoid death. Even the Creator has not told any way to avoid it. In such circumstances when death is inevitable and if one can attain heaven and always have fame and glory due to a suitable death, then who will be the man who will not accept such a glorious death?
तात्पर्य
यदि मरने से कोई उच्चतर ग्रह प्रणालियों में उन्नत हो सकता है और अपनी मृत्यु के बाद हमेशा प्रसिद्ध हो सकता है, तो कौन इतना मूर्ख है कि वह ऐसी गौरवशाली मृत्यु से इनकार कर देगा? कृष्ण ने भी अर्जुन को यही सलाह दी थी। भगवान ने कहा, "हे अर्जुन," "युद्ध से विमुख न हो। यदि आप युद्ध में विजय प्राप्त करते हैं, तो आप एक राज्य का आनंद लेंगे, और यदि आप मर भी जाते हैं तो आप स्वर्गीय ग्रहों पर चले जाएंगे।" गौरवशाली कार्यों को करते हुए सभी को मरने के लिए तैयार रहना चाहिए। एक गौरवशाली व्यक्ति का मतलब बिल्लियों और कुत्तों की तरह मृत्यु से मिलना नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)