श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 10: देवताओं तथा वृत्रासुर के मध्य युद्ध  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  6.10.13-14 
अथेन्द्रो वज्रमुद्यम्य निर्मितं विश्वकर्मणा ।
मुने: शक्तिभिरुत्सिक्तो भगवत्तेजसान्वित: ॥ १३ ॥
वृतो देवगणै: सर्वैर्गजेन्द्रोपर्यशोभत ।
स्तूयमानो मुनिगणैस्त्रैलोक्यं हर्षयन्निव ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् राजा इंद्र ने विश्वकर्मा द्वारा दधीचि की हड्डियों से निर्मित वज्र को दृढ़तापूर्वक हाथ में लिया। दधीचि मुनि की परम शक्ति से भरपूर और भगवान विष्णु के तेज से प्रकाशित होकर इंद्र अपने वाहन ऐरावत की पीठ पर सवार हुआ। समस्त देवता उसे घेरे हुए थे और सभी मुनिगण उसकी प्रशंसा कर रहे थे। इस प्रकार जब वह वृत्रासुर का वध करने के लिए सवार होकर चला तो वह अत्यंत सुशोभित हो रहा था और तीनों लोकों को सुखद लग रहा था।
 
Thereafter King Indra held firmly the Vajra made by Vishwakarma from the bones of Dadhichi. Imbued with the supreme power of sage Dadhichi and illuminated by the brilliance of Shri Bhagwan, Indra rode on the back of his vehicle Airavat. All the gods surrounded him and all the sages were praising him. Thus when he rode on to kill Vritrasura, he looked extremely graceful and was liked by all the three worlds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)