श्रीबादरायणिरुवाच
एवं कृतव्यवसितो दध्यङ्ङाथर्वणस्तनुम् ।
परे भगवति ब्रह्मण्यात्मानं सन्नयञ्जहौ ॥ ११ ॥
अनुवाद
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा - इस प्रकार धर्वा के पुत्र दधीचि मुनि ने देवताओं के लिए अपने शरीर का त्याग करने का निश्चय किया। उन्होंने अपने आप को परम पुरुषोत्तम भगवान् के चरणों में अर्पित कर दिया और इस प्रकार पाँच तत्वों से बना अपना स्थूल शरीर त्याग दिया।
Sri Shukdev Goswami said—Thus, Sage Dadhichi, the son of Arthava, decided to give up his body for the service of the gods. He placed himself (soul) at the feet of the Supreme Personality of Godhead and gave up his gross body made of the five elements.
तात्पर्य
जैसे कि 'परे भागवती ब्रह्मण्य आत्मानं संनयन' के शब्दों से संकेत मिलता है, दधीचि ने स्वयं को आत्मा के रूप में परमेश्वर श्री भगवान के चरणों में सौंप दिया था। इस संबंध में, श्रीमद्-भागवत (1.13.55) के पहले सर्ग में वर्णित धृतराष्ट्र द्वारा अपने शरीर को त्यागने की घटना का उल्लेख किया जा सकता है। धृतराष्ट्र ने अपने स्थूल शरीर को जिन पांच विभिन्न तत्वों - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश - से मिलकर बना था, उनका विश्लेषणात्मक रूप से विखंडन किया और उन्हें इन तत्वों के विभिन्न भंडारों में वितरित किया; दूसरे शब्दों में, उन्होंने इन पांच तत्वों का मूल महातत्त्व में विलय कर दिया। जीवन के बारे में अपनी भौतिक दृष्टिकोण की पहचान करके, उन्होंने धीरे-धीरे अपनी आत्मा को भौतिक संबंधों से अलग किया और उसे परमेश्वर श्री भगवान के चरणों में सौंप दिया। इस संबंध में दिया गया उदाहरण यह है कि जब मिट्टी का घड़ा टूट जाता है, तो घड़े के भीतर आकाश का छोटा हिस्सा घड़े के बाहर के बड़े आकाश के साथ मिल जाता है। मायावादी दार्शनिक श्रीमद्-भागवत के इस वर्णन को गलत समझते हैं। इसलिए श्री रामानुज स्वामी ने अपनी पुस्तक वेदांत-तत्त्व-सार में वर्णन किया है कि आत्मा का यह विलय इसका अर्थ है कि व्यक्तिगत आत्मा आठ तत्वों से बने भौतिक शरीर - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, झूठे अहंकार, मन और बुद्धि - से खुद को अलग करने के बाद, परमेश्वर श्री भगवान के शाश्वत रूप (ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानंद-विग्रहः / अनादिर् आदिर् गोविन्दः सर्व-कारण-कारणम्) में अपनी भक्ति सेवा में संलग्न हो जाता है। भौतिक तत्वों का भौतिक कारण भौतिक शरीर को अवशोषित कर लेता है, और आध्यात्मिक आत्मा अपने मूल स्थान को ग्रहण कर लेती है। जैसा कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने वर्णन किया है, जीवा 'स्वरूप' हय कृष्णरा 'नित्य-दास': जीवन-सत्ता की संवैधानिक स्थिति यह है कि वह कृष्ण का शाश्वत सेवक है। जब कोई आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति सेवा की साधना के माध्यम से भौतिक शरीर पर विजय प्राप्त कर लेता है, तो वह अपनी स्थिति को पुनर्जीवित कर सकता है और इस प्रकार प्रभु की सेवा में संलग्न हो सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥