श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  6.1.45 
येन यावान्यथाधर्मो धर्मो वेह समीहित: ।
स एव तत्फलं भुङ्क्ते तथा तावदमुत्र वै ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
इस जीवन में अपने धार्मिक या अधार्मिक कार्यों की परिमाण के अनुपात में मनुष्य अपने अगले जीवन में अपने कर्मों के अनुसार सुख या दुख प्राप्त करता है।
 
In proportion to the amount of his religious or irreligious actions in this life, a man enjoys the fruits or suffers the consequences of his actions in his next life.
तात्पर्य
भगवद् गीता (१४.१८) में कथित है:

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था

मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।

जघन्य गुणवृत्तिस्था

अधो गच्छन्ति तामसाः॥

जो सतोगुण में स्थित होकर कार्य करते हैं वे ऊँचे लोक में देवगण बन जाते हैं। जो सामान्य रूप से कार्य करते हैं और अति पापाचार में नहीं पड़ते वे मध्यम लोक में रहते हैं। जो जघन्य पाप कर्म करते हैं उन्हें नारकीय जीवन को प्राप्त होना पड़ता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)