श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  6.1.42 
सूर्योऽग्नि: खं मरुद्देव: सोम: सन्ध्याहनी दिश: ।
कं कु: स्वयं धर्म इति ह्येते दैह्यस्य साक्षिण: ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
सूर्य, आग, आकाश, वायु, देवता, चंद्रमा, सांझ, दिन, रात, दिशाएं, पानी, भूमि और स्वयं परमात्मा - ये सभी जीव के कार्यों के साक्षी हैं।
 
Sun, fire, sky, wind, gods, moon, evening, day, night, directions, water, land and God himself - all these are witnesses to the actions of the living being.
तात्पर्य
कुछ धार्मिक संप्रदायों के सदस्य, विशेष रूप से ईसाई, कर्म क्रिया में विश्वास नहीं करते। एक बार हमारी एक विद्वान ईसाई प्रोफेसर से चर्चा हुई थी, जिसने तर्क दिया कि हालाँकि लोगों को आमतौर पर उनके दुष्कर्मों के गवाहों की गवाही के बाद दंडित किया जाता है, उन लोगों के लिए गवाह कहाँ हैं जो पिछले कर्मों की प्रतिक्रियाओं से पीड़ित हैं? ऐसे व्यक्ति के लिए यमदूतों का उत्तर यहाँ दिया गया है। एक सशर्त आत्मा सोचती है कि वह चोरी-छिपे काम कर रहा है और उसकी पापमय गतिविधियों को कोई नहीं देख सकता है, लेकिन हम शास्त्रों से समझ सकते हैं कि सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, चंद्रमा, देवता, शाम, दिन, रात, दिशाएँ, पानी, भूमि और स्वयं परमात्मा सहित कई गवाह हैं, जो व्यक्तिगत आत्मा के साथ उसके हृदय में बैठते हैं। गवाहों की कमी कहाँ है? गवाह और सर्वोच्च भगवान दोनों मौजूद हैं, और इसलिए कई जीवों को उच्च ग्रह प्रणालियों में ऊपर उठाया जाता है या निम्न ग्रह प्रणालियों में गिराया जाता है, जिसमें नारकीय ग्रह भी शामिल हैं। कोई विसंगतियाँ नहीं हैं, क्योंकि सब कुछ सर्वोच्च ईश्वर के प्रबंधन (स्वाभाविकी ज्ञान-बल-क्रिया कै) द्वारा पूरी तरह से व्यवस्थित है। इस श्लोक में वर्णित गवाहों का उल्लेख अन्य वैदिक साहित्य में भी किया गया है:

आदित्य-चंद्राव अनिलोऽनलश्च

द्यौर भूमीर आपो हृदयं यमश्च

अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्या

धर्मोऽपि जानति नरस्य वृत्तम्

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)