श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  6.1.30 
निशम्य म्रियमाणस्य मुखतो हरिकीर्तनम् ।
भर्तुर्नाम महाराज पार्षदा: सहसापतन् ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन्! जब विष्णुदूतों ने मरणासन्न अजामिल के मुँह से अपने स्वामी का पवित्र नाम सुना, जिसे उसने निश्चित ही पूरी घबराहट में बिना किसी अपराध भाव के उच्चारण किया था, तो वे तुरंत वहाँ आ पहुँचे।
 
O King, when the messengers of Viṣṇu heard the holy name of their lord from the mouth of the dying Ajāmila, who obviously uttered it innocently in great distress, they immediately arrived there.
तात्पर्य
श्रीला विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की टिप्पणी है, हरि-कीर्तनं निशम्यापतन, कथम्-भूतस्य भर्तु नाम ब्रूवतः: भगवान विष्णु के आदेश वाहक आए क्योंकि अजामिल ने नारायण के पवित्र नाम का पाठ किया था। उन्होंने यह नहीं सोचा कि वह क्यों जप कर रहे थे। नारायण के नाम का जाप करते हुए, अजामिल वास्तव में अपने पुत्र के बारे में सोच रहे थे, लेकिन सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने अजामिल को भगवान का नाम जपते हुए सुना, भगवान विष्णु के आदेश वाहक, विष्णुदूत, अजामिल की सुरक्षा के लिए तुरंत आए। हरि-कीर्तन वास्तव में भगवान के पवित्र नाम, रूप, लीलाओं और गुणों का गुणगान करने के लिए है। हालाँकि, अजामिल ने भगवान के रूप, गुणों या सामग्री की महिमा नहीं की; उन्होंने केवल पवित्र नाम का जाप किया। फिर भी, वह जप उसे सभी पापपूर्ण गतिविधियों से शुद्ध करने के लिए पर्याप्त था। जैसे ही विष्णुदूतों ने अपने स्वामी का नाम सुना, वे तुरंत आ गए। इस संबंध में श्रीला विजयध्वज तीर्थ टिप्पणी करते हैं: अनेन पुत्र-स्नेहम अन्तरेण प्राचीनदृष्ट-बलाद् उद्भूताय भक्त्या भगवन्-नाम-संकीर्तनं कृतं इति ज्ञायते। "अजामिल ने अपने पुत्र के प्रति अत्यधिक लगाव के कारण नारायण के नाम का जाप किया। फिर भी, नारायण को भक्ति सेवा प्रदान करने के अपने पिछले सौभाग्य के कारण, उन्होंने स्पष्ट रूप से पूर्ण भक्ति सेवा में और बिना अपराधों के पवित्र नाम का जाप किया।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)