श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  6.1.27 
स एवं वर्तमानोऽज्ञो मृत्युकाल उपस्थिते ।
मतिं चकार तनये बाले नारायणाह्वये ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
जब मूर्ख अजामिल के प्राण निकलने का समय आ गया तो उसके मन में सिर्फ और सिर्फ अपने पुत्र नारायण के प्रति ही विचार उमड़ने लगे।
 
When the time of death came for the foolish Ajamil, he started thinking only about his son Narayana.
तात्पर्य
श्रीमद-भागवतम्‌ (२.१.६) के दूसरे काण्‍ड में शुकदेव गोस्‍वामी कहते हैं:

एतावान्‌ साङ्‍ख्य-योगाभ्‍यां

स्‍वधर्मा-परिणिष्‍ठया

जन्‍म-लाभः परः पुंसाम्‌

अन्‍ते नारायण-स्‍मृतिः

"पदार्थ और आत्‍मा के सम्‍पूर्ण ज्ञान से, रहस्‍यमय शक्तियों को प्राप्‍त करने से या अपने व्‍यवसायिक कर्तव्‍यों का पालन करने से मनुष्‍य जीवन की सर्वोच्‍च पूर्णता तभी प्राप्‍त होती है जब जीवन के अंत में भगवान के व्‍यक्तित्‍व को याद किया जाए।" किसी तरह, अजामिल ने मृत्‍यु के समय होश में या बेशुमार नारायण के नाम का जाप किया (अन्‍ते नारायण-स्‍मृतिः), और इसलिए वह केबल नारायण के नाम पर अपना ध्‍यान केंद्रित करके सर्व-पूर्ण बन गया।

यह भी निष्‍कर्ष निकाला जा सकता है कि अजामिल, जो कि एक ब्राह्मण का पुत्र था, अपनी युवावस्‍था में नारायण की पूजा करता था क्‍योंकि हर ब्राह्मण के घर में नारायण-शिला की पूजा होती है। यह पद्धति भारत में अभी भी प्रचलित है; एक सख्‍त ब्राह्मण के घर में, नारायण-सेवा, नारायण की पूजा होती है। इसलिए, हालाँकि दूषित अजामिल अपने पुत्र को पुकार रहा था, पर नारायण के पवित्र नाम पर अपना ध्‍यान केंद्रित करके उसने नारायण को याद किया जिसकी अपनी युवावस्‍था में बहुत निष्‍ठा से पूजा की थी।

इस संबंध में श्रील श्रीधरस्‍वामी ने अपने मत को निम्‍न प्रकार से व्‍यक्‍त किया है: एतच्‍च तद-उपलालनादि-श्री-नारायण-नामच्‍चारण-माहात्‍म्‍येन तद-भक्तिरेवाभूदिति सिद्धान्तोपयोगित्‍वेनापि द्रष्‍टव्‍यम्‌। "भक्ति सिद्धांत के अनुसार, यह विश्‍लेषण किया जाना चाहिए कि क्‍योंकि अजामिल ने लगातार अपने बेटे के नाम नारायण का जाप किया, उसका स्‍तर भक्ति के स्‍तर तक उठ गया था, हालाँकि वह यह नहीं जानता था।" इसी प्रकार, श्रील वीरराघव आचार्य यह मत देते हैं: एवं वर्तमानः स द्विजः मृत्‍यु-काले उपस्थित सत्यज्ञो नारायणाग्‍ये पुत्र एव मतिं चकार मतिं आसक्‍तामकरोदित्यर्थः। "हालाँकि मृत्‍यु के समय वह अपने बेटे का नाम जप रहा था, फिर भी उसने अपना ध्‍यान नारायण के पवित्र नाम पर केंद्रित किया।" श्रील विजयध्‍वज तीर्थ एक ऐसा ही मत देते हैं:

मृत्‍यु-काले देह-वियोग-लक्ष्ण-काले मृत्‍योः सर्व-दोष-पाप-हरस्य हररनुग्रहात काले दत्‍त-ज्ञान-लक्ष्णे उपस्थिते हृदि प्रकाशिते तनये पूरण-ज्ञाने बाले पंच-वर्ष-कल्पे प्रादेश-मात्रे नारायणाह्वये मूर्ति-विशेषे मतिं स्‍मरण-समर्थं चित्तं चकार भक्‍त्यास्‍मरदित्यर्थः।

प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष रूप से, अजामिल ने वास्‍तव में मृत्‍यु के समय नारायण को याद किया था (अन्‍ते नारायण-स्‍मृतिः)।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)