श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  6.1.26 
भुञ्जान: प्रपिबन् खादन् बालकं स्‍नेहयन्त्रित: ।
भोजयन् पाययन् मूढो न वेदागतमन्तकम् ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
जब अजामिल खाना खाता तो बच्चे को भी खाने के लिए कहता और जब वह कुछ पीता तो उसे भी पीने के लिए बुलाता। हमेशा बच्चे की देख-भाल करने और उसका नाम, नारायण पुकारने में लगे रहने के कारण अजामिल को यह समझ नहीं आया कि उसका समय अब खत्म होने वाला है और मृत्यु उसके सिर पर आ चुकी है।
 
When Ajamil ate food, he would call the boy to eat and when he drank something, he would call him to drink too. Always busy taking care of the boy and calling his name, Ajamil did not understand that his time was over and death was upon him.
तात्पर्य
परमेश्वर दीन-हीनों पर अनुग्रह करते हैं। यद्यपि यह जीव भगवान नारायण को भूल गया था परन्तु वह अपने पुत्र को पुकारता था - "नारायण, आइए, भोजन कीजिए। नारायण, आइए, दूध पीजिए।" इसलिए, किसी-न-किसी तरह से उसका नारायण-नाम से लगाव था। इसी को अज्ञात-सुकृति कहते हैं। वह यद्यपि अपने पुत्र को बुला रहा था, परन्तु अनजाने में वह नारायण का नाम जप रहा था और परमेश्वर का पवित्र नाम इतना प्रभावशाली है कि उसका जप गिना जा रहा था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)