श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  6.1.21 
कान्यकुब्जे द्विज: कश्चिद्दासीपतिरजामिल: ।
नाम्ना नष्टसदाचारो दास्या: संसर्गदूषित: ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
कान्यकुब्ज नामक नगर में रहने वाले अजामिल नामक ब्राह्मण ने एक वेश्यादासी से विवाह किया। उसके साथ रहते हुए निम्न श्रेणी की महिला की संगति में उसे अपने सभी ब्राह्मणिक गुणों को खोना पड़ा।
 
In a city called Kanyakubja there lived a Brahmin named Ajamil, who married a prostitute maid and lost all his Brahmin qualities by associating with that low-class woman.
तात्पर्य
स्त्रियों से अवैध संबंध का दोष यह है कि इससे व्यक्ति सभी ब्राह्मणों वाले गुणों को खो देता है। भारत में अब भी नौकरों की एक जाति है, जिन्हें शूद्र कहते हैं, इनकी नौकरानी को शूद्राणी कहते हैं। कभी कभी, कुछ बहुत कामुक लोग ऐसी नौकरानियों और सफाई करने वाली महिलाओं से संबंध स्थापित कर लेते हैं क्योंकि समाज के उच्च स्तर में स्त्री-लोलुपता की आदत पूरी नहीं कर सकते, जो की सामाजिक मान्यताओं द्वारा सख्त मना है। अजामिल एक शिक्षित ब्राह्मण थे, किसी वेश्या के संपर्क में आने की वजह से अपने सभी ब्राह्मण वाले गुणों को खो दिया, लेकिन अन्ततः उनकी रक्षा इसीलिए हो गई क्योंकि उन्होंने भक्ति-योग की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। इसीलिए पिछले श्लोक में शुकादेव गोस्वामी ने उस व्यक्ति की बात की है जिसने केवल एक बार ही भगवान के कमल चरणों में आत्मसर्पण किया है (मनः कृष्ण-पदारविंदयोः) या भक्ति-योग की प्रक्रिया को शुरू ही किया है। भक्ति-योग, श्रवणं कीर्तनं विष्णोः से शुरू होता है, भगवान विष्णु के नामों को सुनना और जपना, जैसे महामंत्र में - हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे / हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे। जप, भक्ति-योग की शुरुआत है। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं:

हरि नाम हरि नाम

हरि नामैव केवलम

कलौ नास्त्येव नास्त्येव

नास्त्येव गतिरन्यथा

"इस कलह और पाखंड के युग में, मोक्ष का एक ही साधन है, भगवान का पवित्र नाम जपना। कोई और रास्ता नहीं है। कोई और रास्ता नहीं है। कोई और रास्ता नहीं है।" भगवान का पवित्र नाम जपने की प्रक्रिया हमेशा ही अत्यधिक प्रभावी होती है, लेकिन विशेष रूप से कलियुग में यहअधिक प्रभावी है। इसकी व्यावहारिक प्रभावशीलता को अब शुकादेव गोस्वामी, अजामिल की कथा द्वारा बताएंगे, जो कि यमदूत के हाथों से केवल नारायण का पवित्र नाम जपने के कारण ही छूट गए थे। परीक्षित महाराज का मूल प्रश्न था कि कैसे नरक या यमदूत के हाथों में गिरने से मुक्त हो। उत्तर में, शुकादेव गोस्वामी परीक्षित महाराज को भक्ति-योग की शक्ति को समझाने के लिए इस पुराने ऐतिहासिक उदाहरण का हवाला दे रहे हैं, जो कि केवल भगवान का नाम जपने से शुरू होता है। भक्ति-योग के सभी महान अधिकारी भक्ति प्रक्रिया के साथ कृष्ण का पवित्र नाम जपने से शुरू करने की सलाह देते हैं (तन-नामा-ग्रहणा-दिभिः)।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)