हरि नाम हरि नाम
हरि नामैव केवलम
कलौ नास्त्येव नास्त्येव
नास्त्येव गतिरन्यथा
"इस कलह और पाखंड के युग में, मोक्ष का एक ही साधन है, भगवान का पवित्र नाम जपना। कोई और रास्ता नहीं है। कोई और रास्ता नहीं है। कोई और रास्ता नहीं है।" भगवान का पवित्र नाम जपने की प्रक्रिया हमेशा ही अत्यधिक प्रभावी होती है, लेकिन विशेष रूप से कलियुग में यहअधिक प्रभावी है। इसकी व्यावहारिक प्रभावशीलता को अब शुकादेव गोस्वामी, अजामिल की कथा द्वारा बताएंगे, जो कि यमदूत के हाथों से केवल नारायण का पवित्र नाम जपने के कारण ही छूट गए थे। परीक्षित महाराज का मूल प्रश्न था कि कैसे नरक या यमदूत के हाथों में गिरने से मुक्त हो। उत्तर में, शुकादेव गोस्वामी परीक्षित महाराज को भक्ति-योग की शक्ति को समझाने के लिए इस पुराने ऐतिहासिक उदाहरण का हवाला दे रहे हैं, जो कि केवल भगवान का नाम जपने से शुरू होता है। भक्ति-योग के सभी महान अधिकारी भक्ति प्रक्रिया के साथ कृष्ण का पवित्र नाम जपने से शुरू करने की सलाह देते हैं (तन-नामा-ग्रहणा-दिभिः)।
