श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 1: अजामिल के जीवन का इतिहास  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  6.1.10 
क्‍वचिन्निवर्ततेऽभद्रात्‍क्‍वचिच्चरति तत्पुन: ।
प्रायश्चित्तमथोऽपार्थं मन्ये कुञ्जरशौचवत् ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
कभी-कभी कोई व्यक्ति पाप न करने के लिए चाहे कितना भी सतर्क क्यों न हो, वह फिर से बुरी आदतों के चक्कर में फंस जाता है। इसलिए मैं बार-बार पाप करने और प्रायश्चित्त करने की इस प्रक्रिया को बेकार मानता हूँ। यह हाथी के नहाने जैसा है क्योंकि हाथी पूरी तरह नहाकर खुद को साफ करता है, लेकिन जमीन पर वापस आते ही वह अपने सिर और शरीर पर धूल डाल लेता है।
 
Sometimes a person who is very careful not to commit sins again falls into the trap of sinful life. Therefore I consider this method of repeatedly committing sins and then atoning for it to be futile. This is like an elephant bathing, because the elephant makes itself clean by taking a complete bath, but as soon as it comes back to the ground, it puts dust on its head and body.
तात्पर्य
जब परीक्षित महाराज ने पूछा कि कैसे एक मानव स्वयं को पाप कर्मों से मुक्त करे ताकि मृत्यु के बाद नारकीय ग्रह प्रणालियों में जाने को बाध्य न होना पड़े, तो शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया कि पाप युक्त जीवन का प्रतिकार करने की प्रक्रिया ही प्रायश्चित है। इस तरह शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित की बुद्धि की परीक्षा ली, जिन्होंने इस प्रक्रिया को वास्तविक स्वीकार करने से मना करके परीक्षा पास कर ली। अब परीक्षित महाराज अपने आध्यात्मिक गुरु शुकदेव गोस्वामी से दूसरे उत्तर की अपेक्षा कर रहे हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)