श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 9: जड़ भरत का सर्वोत्कृष्ट चरित्र  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.9.6 
एवं स्वतनुज आत्मन्यनुरागावेशितचित्त: शौचाध्ययनव्रतनियमगुर्वनलशुश्रूषणाद्यौपकुर्वाणककर्माण्यनभियुक्तान्यपि समनुशिष्टेन भाव्यमित्यसदाग्रह: पुत्रमनुशास्य स्वयं तावद् अनधिगतमनोरथ: कालेनाप्रमत्तेन स्वयं गृह एव प्रमत्त उपसंहृत: ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
जड़ भरत का ब्राह्मण पिता अपने बेटे की तरह अत्याधिक अनुरक्त था। उसने सोचा कि उसे अच्छी शिक्षा दिलवाना उचित है और उसने उसे ब्रह्मचर्य के नियमों और विनियमों को सिखाना शुरू कर दिया, जिसमें वैदिक अनुष्ठान, शुद्धता, वेदों का अध्ययन, कर्मकांड, गुरु की सेवा और अग्नि यज्ञ करने की विधि शामिल थी। उसने पूरी कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो पाया। वह दिल में उम्मीद रखता था कि उसका बेटा विद्वान बनेगा, परंतु उसके सारे प्रयास असफल रहे। हर किसी की तरह वह ब्राह्मण भी अपने घर के प्रति आसक्त था और वह भूल गया था कि एक दिन उसे मरना है। मौत कभी नहीं भूलती। वह सही समय पर आई और उसे ले गई।
 
The Brahmin father of Jad Bharat considered his son as his soul and heart, so he was very attached to him. He wanted to make his son well educated and in this unsuccessful attempt he started teaching his son the rules and regulations of Brahmacharya, which included Vedic rituals, cleanliness, study of Vedas, rituals, service to the Guru, the method of performing Agni Yajna. He tried his best to educate his son in this way, but he was unsuccessful. He had kept the hope in his heart that his son would be a scholar, but all his efforts were futile. Like every living being, this Brahmin was also attached to his home and he forgot that one day he has to die. But death never forgets. It appeared at the right time and took him away.
तात्पर्य
जो लोग पारिवारिक जीवन में अत्यधिक आसक्त होते हैं और यह भूल जाते हैं कि भविष्य में मृत्यु उन्हें उनसे दूर ले जाएगी, वे आसक्त हो जाते हैं और मनुष्य के रूप में अपने कर्तव्य को पूरा करने में असमर्थ हो जाते हैं। मानव जीवन का कर्तव्य जीवन की सभी समस्याओं का समाधान करना है, लेकिन इसके बजाय लोग पारिवारिक मामलों और कर्तव्यों में ही आसक्त रहते हैं। हालाँकि वे मृत्यु को भूल जाते हैं, मृत्यु उन्हें नहीं भूलेगी। अचानक उन्हें सुखी पारिवारिक जीवन के प्लेटफॉर्म से बाहर कर दिया जाएगा। कोई भूल सकता है कि उसे मरना है, लेकिन मृत्यु कभी नहीं भूलती। मृत्यु हमेशा सही समय पर आती है। जड़ भरत के ब्राह्मण पिता अपने पुत्र को ब्रह्मचर्य की प्रक्रिया सिखाना चाहते थे, लेकिन अपने पुत्र की वैदिक उन्नति की प्रक्रिया से गुजरने की अनिच्छा के कारण वे असफल रहे। जड़ भरत को केवल श्रवणं कीर्तनं विष्णोः के माध्यम से भक्ति सेवा करने के द्वारा घर लौटने, वापस भगवान् के पास जाने की चिंता थी। उसने अपने पिता के वैदिक निर्देशों की परवाह नहीं की। जब कोई व्यक्ति भगवान की सेवा में पूरी तरह से रुचि रखता है, तो उसे वेदों में उल्लिखित सभी विनियामक सिद्धांतों का पालन करने की आवश्यकता नहीं होती है। बेशक, एक साधारण व्यक्ति के लिए वैदिक सिद्धांत अनिवार्य हैं। कोई भी उनसे बच नहीं सकता। लेकिन जब कोई व्यक्ति भक्ति सेवा की पूर्णता प्राप्त कर लेता है, तो वैदिक सिद्धांतों का पालन करना बहुत महत्वपूर्ण नहीं रह जाता है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को त्रिगुण्य, वैदिक सिद्धांतों से भी ऊपर, आध्यात्मिक स्थिति पर चढ़ने की सलाह दी थी।

त्रैगुण्य विषया वेदा

निर्गुण्यो भवार्जुन

निर्द्वंद्वो नित्यसत्वस्थो

निरयोगक्षेम आत्मवान

"वेद मुख्य रूप से भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के विषय में बताते हैं। हे अर्जुन, इन गुणों से ऊपर उठो। उन सभी से ऊपर उठो। सभी द्वंदों और लाभ-हानि की चिंताओं से मुक्त रहो और आत्मा में स्थापित रहो।" (भगवद्गीता 2.45)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)