स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर् हरि-तोषनम्। - भागवत 1.2.13
हरि अर्थात भगवान को संतुष्ट करना होता है, यही कर्म प्रधान क्रियाओं के विधि-विधानों की सिद्धि है। श्रीमद् भागवत में इस संबंध में और भी लिखा है:-
धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विश्व-क्षेण-कथासु यः।
न उत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्। - भागवत 1.2.8
“मनुष्यों द्वारा अपने कर्मों के अनुसार किए गए कर्म चाहे किसी भी प्रकार के हों, यदि वे परमपुरुष की कथा के प्रति आसक्ति उत्पन्न नहीं करते हैं तो वे केवल व्यर्थ श्रम ही हैं।” (भागवत 1.2.8) कर्मकाण्ड की क्रियाओं की आवश्यकता तब तक है जब तक कि व्यक्ति में कृष्ण चेतना का विकास न हो जाए। यदि व्यक्ति कृष्ण चेतना में विकसित हो गया है तब उसे कर्मकाण्ड के पूर्व विधि-विधानों का पालन करने की आवश्यकता नहीं रह जाती है। श्रील माध्वेन्द्रपुरी जी ने कहा- हे कर्मकाण्ड के विधि-विधानों ! मुझसे क्षमा करें। मैं इन सब विधि-विधानों का पालन नहीं कर सकता क्योंकि मैं पूर्ण रूप से भक्ति सेवा में व्यस्त हूँ।” उन्होंने किसी वृक्ष के नीचे बैठकर निरंतर हरि कृष्ण महामंत्र का उच्चारण करते रहने की इच्छा व्यक्त की। इस तरह से उन्होंने सारे विधि-विधानों का पालन नहीं किया। इसी तरह से हरिदास ठाकुर का जन्म एक मुसलमान परिवार में हुआ था। अपने जीवन के आरम्भ से ही उनका कर्मकाण्ड की पद्धति में कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया था, परंतु वह निरंतर प्रभु का पवित्र नाम जपते रहते थे, अतः श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें हरिनाम संकीर्तन के अधिकारी के रूप में स्वीकार कर लिया। जड़ भरत के समान ही भरत महाराज का चित्त निरंतर भक्ति में ही लगा रहता था। पूर्व के तीन जन्मों में उन्होंने विधि-विधानों का पालन किया था और अब इस जन्म में अपनी इच्छानुसार उन्होंने विधि-विधानों का पालन नहीं किया यद्यपि उनके ब्राह्मण पिता चाहते थे कि वे इनका पालन करें।
