श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 9: जड़ भरत का सर्वोत्कृष्ट चरित्र  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.9.3 
तत्रापि स्वजनसङ्गाच्च भृशमुद्विजमानो भगवत: कर्मबन्धविध्वंसनश्रवणस्मरणगुणविवरणचरणारविन्दयुगलं मनसा विदधदात्मन: प्रतिघातमाशङ्कमानो भगवदनुग्रहेणानुस्मृतस्वपूर्वजन्मावलिरात्मानमुन्मत्तजडान्धबधिरस्वरूपेण दर्शयामास लोकस्य ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
भगवत्कृपा से भरत महाराज को अपने पिछले जन्म की घटनाएँ याद थीं। हालाँकि उन्हें ब्राह्मण का शरीर मिला था, लेकिन वे अपने उन रिश्तेदारों और दोस्तों से बहुत डरते थे जो भक्त नहीं थे। वे हमेशा ऐसी संगति से बहुत सावधान रहते थे क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं वे फिर से पथभ्रष्ट न हो जाएँ। नतीजतन उन्होंने जनता की नजरों में खुद को एक पागल - सुस्त, अंधा और बहरा दिखाया - ताकि दूसरे लोग उनसे बात करने की कोशिश न करें। इस तरह उन्होंने खुद को बुरी संगति से बचा लिया। अपने मन में वे हमेशा भगवान के चरण-कमलों के बारे में सोचते रहे और भगवान के गुणों का जाप करते रहे, जो व्यक्ति को फलदायी कर्म के बंधन से बचाता है। इस तरह उन्होंने खुद को अभक्त संगियों के हमले से बचाए रखा।
 
By the grace of the Lord, King Bharata remembered the events of his previous life. Although he had attained the body of a brahmana, he was very afraid of his relatives and friends who were not devotees. He was always cautious of such company, for he feared he might again go astray. Consequently, he appeared before the people as a madman, an idiot, a blind man and a deaf man, so that others would not try to talk to him. Thus he kept himself away from bad company. He always meditated on the Lord's lotus feet in his heart and kept reciting His qualities, which save a man from the bondage of karma. Thus he kept himself safe from the attacks of nondevotee companions.
तात्पर्य
प्रत्येक जीव प्रकृति के गुणों के साथ जुड़ने के कारण विभिन्न गतिविधियों से बंधा होता है। जैसा कि भगवद गीता में कहा गया है, कारणं गुणसंगोस्य सद् असद-योनि-जन्मसु: "यह उसके उस भौतिक प्रकृति के साथ जुड़ने के कारण है। इस तरह वह विभिन्न प्रजातियों में अच्छे और बुरे से मिलता है"। (भगवान 13.22)

हम अपने कर्म के अनुसार 8,400,000 प्रजातियों में विभिन्न प्रकार के शरीर प्राप्त करते हैं। कर्माण दैव-नेत्रेण: हम तीनों गुणों से दूषित भौतिक प्रकृति के प्रभाव में काम करते हैं, और इस प्रकार हमें श्रेष्ठ क्रम के अनुसार एक निश्चित प्रकार का शरीर मिलता है। इसे कर्म-बंध कहते हैं। इस कर्म-बंध से बाहर निकलने के लिए, व्यक्ति को भक्ति सेवा में लगना चाहिए। तब वह भौतिक प्रकृति के गुणों से प्रभावित नहीं होगा।

माँ च य अव्याभिचारेण

भक्ति-योगेन सेवते

स गुणान समतीत्यैतान

ब्रह्म-भूयाय कल्पते

"जो पूर्ण भक्ति सेवा में संलग्न है, जो किसी भी परिस्थिति में पतन नहीं करता, वह तुरंत भौतिक प्रकृति के गुणों को पार कर जाता है और इस तरह ब्रह्म के स्तर पर आ जाता है"। (भगवान 14.26) भौतिक गुणों से सुरक्षित रहने के लिए, व्यक्ति को भक्ति सेवा में लगना चाहिए - श्रवण किर्तनं विष्णोः। यही जीवन की पूर्णता है। जब महाराज भरत ने एक ब्राह्मण के रूप में जन्म लिया, तो उन्हें ब्राह्मण के कर्तव्यों में बहुत रुचि नहीं थी, लेकिन भीतर वे एक शुद्ध वैष्णव बने रहे, जो हमेशा भगवान के चरण कमलों के बारे में सोचते रहते थे। जैसा कि भगवद-गीता में सलाह दी गई है: मन-मना भव मद-भक्तो मद-याजी माँ नमस्करु। यही एकमात्र प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति को बार-बार जन्म और मृत्यु के खतरे से बचाया जा सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)