हम अपने कर्म के अनुसार 8,400,000 प्रजातियों में विभिन्न प्रकार के शरीर प्राप्त करते हैं। कर्माण दैव-नेत्रेण: हम तीनों गुणों से दूषित भौतिक प्रकृति के प्रभाव में काम करते हैं, और इस प्रकार हमें श्रेष्ठ क्रम के अनुसार एक निश्चित प्रकार का शरीर मिलता है। इसे कर्म-बंध कहते हैं। इस कर्म-बंध से बाहर निकलने के लिए, व्यक्ति को भक्ति सेवा में लगना चाहिए। तब वह भौतिक प्रकृति के गुणों से प्रभावित नहीं होगा।
माँ च य अव्याभिचारेण
भक्ति-योगेन सेवते
स गुणान समतीत्यैतान
ब्रह्म-भूयाय कल्पते
"जो पूर्ण भक्ति सेवा में संलग्न है, जो किसी भी परिस्थिति में पतन नहीं करता, वह तुरंत भौतिक प्रकृति के गुणों को पार कर जाता है और इस तरह ब्रह्म के स्तर पर आ जाता है"। (भगवान 14.26) भौतिक गुणों से सुरक्षित रहने के लिए, व्यक्ति को भक्ति सेवा में लगना चाहिए - श्रवण किर्तनं विष्णोः। यही जीवन की पूर्णता है। जब महाराज भरत ने एक ब्राह्मण के रूप में जन्म लिया, तो उन्हें ब्राह्मण के कर्तव्यों में बहुत रुचि नहीं थी, लेकिन भीतर वे एक शुद्ध वैष्णव बने रहे, जो हमेशा भगवान के चरण कमलों के बारे में सोचते रहते थे। जैसा कि भगवद-गीता में सलाह दी गई है: मन-मना भव मद-भक्तो मद-याजी माँ नमस्करु। यही एकमात्र प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति को बार-बार जन्म और मृत्यु के खतरे से बचाया जा सकता है।
