न वा एतद्विष्णुदत्त महदद्भुतं यदसम्भ्रम: स्वशिरश्छेदन आपतितेऽपि विमुक्तदेहाद्यात्मभावसुदृढहृदयग्रन्थीनां सर्वसत्त्वसुहृदात्मनां निर्वैराणां साक्षाद्भगवतानिमिषारिवरायुधेनाप्रमत्तेन तैस्तैर्भावै: परिरक्ष्यमाणानां तत्पादमूलमकुतश्चिद्भयमुपसृतानां भागवतपरमहंसानाम् ॥ २० ॥
अनुवाद
तब शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित से कहा - हे विष्णुदत्त, जो लोग आत्मा को शरीर से अलग मानते हैं, हृदय के अजेय ग्रंथि से मुक्त हैं, सभी जीवों के कल्याण के कार्यों में लगे रहते हैं और किसी का भी अहित नहीं सोचते हैं, वे सदैव चक्रधारी और असुरों के लिए परमकाल और भक्तों के रक्षक श्रीभगवान द्वारा संरक्षित होते हैं। भक्त सदैव भगवान के चरण कमलों की शरण लेते हैं। फलस्वरूप, सिर कट जाने की स्थिति आने पर भी वे सदैव अक्षुब्ध रहते हैं। यह उनके लिए बिलकुल भी आश्चर्यजनक नहीं होता है।
Then Sukadeva Goswami said to Maharaja Parikshit—O Vishnudatta, a person who considers the soul to be separate from the body, who is free from an invincible heart-complex, who is always devoted to the welfare of all living entities and who does not think of harming others, is always protected by the Chakradhari and the Supreme Time for the demons and the protector of the devotees, Shri Bhagwan. Devotees always take refuge in the lotus feet of the Lord. As a result, they always remain unperturbed even when the occasion of their head being cut off arises. This is not surprising to them at all.
तात्पर्य
ये ईश्वर के परम व्यक्तित्व के एक शुद्ध भक्त के कुछ महान गुण हैं। सबसे पहले, एक भक्त अपनी आध्यात्मिक पहचान के बारे में दृढ़ता से आश्वस्त होता है। वह कभी भी शरीर के साथ अपनी पहचान नहीं बनाता; वह दृढ़ता से आश्वस्त रहता है कि आत्मा शरीर से भिन्न है। परिणामस्वरूप उसे कुछ भी डर नहीं है। भले ही उसके जीवन को खतरा हो सकता है, वह बिल्कुल भी डरता नहीं है। वह दुश्मन को भी दुश्मन की तरह नहीं मानता। भक्तों की ये योग्यताएँ होती हैं। भक्त हमेशा ईश्वर के परम व्यक्तित्व पर पूरी तरह निर्भर रहते हैं और प्रभु हर परिस्थिति में उन्हें पूरी सुरक्षा देने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं।
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध पांच के अंतर्गत नौवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥