श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 9: जड़ भरत का सर्वोत्कृष्ट चरित्र  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  5.9.18 
भृशममर्षरोषावेशरभसविलसितभ्रुकुटिविटपकुटिलदंष्ट्रारुणेक्षणाटोपातिभयानकवदना हन्तुकामेवेदं महाट्टहासमतिसंरम्भेण विमुञ्चन्ती तत उत्पत्य पापीयसां दुष्टानां तेनैवासिना विवृक्णशीर्ष्णां गलात्स्रवन्तमसृगासवमत्युष्णं सह गणेन निपीयातिपानमदविह्वलोच्चैस्तरां स्वपार्षदै: सह जगौ ननर्त च विजहार च शिर:कन्दुकलीलया ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
अपमान सहन न कर पाने के कारण, क्रोधित देवी काली ने अपनी आँखें चमकाईं और अपने नुकीले दाँत दिखाए। उनकी लाल आँखें दहक उठीं और उनका रूप भयावह हो गया। उन्होंने एक डरावना शरीर ग्रहण किया, जैसे कि वे पूरी सृष्टि को नष्ट करने के लिए तैयार थीं। बलिवेदी से ऊँची छलांग लगाते हुए, उन्होंने उसी तलवार से सभी दुष्टों और चोरों का सिर काट दिया जिससे वे जड़ भरत को मारने जा रहे थे। फिर वह कटे हुए सिरों से बहते गर्म खून को पीने लगी, जैसे शराब पी रही हों। दरअसल, उन्होंने अपने साथियों के साथ इस मादक द्रव्य का सेवन किया, जो डाइन और राक्षसी थीं। इस खून से नशे में चूर होकर, वे सभी ऊँची आवाज़ में गाने और नाचने लगीं जैसे कि पूरे ब्रह्मांड को नष्ट कर देंगी। उसी समय, वे उनके सिरों को गेंद की तरह उछालने लगीं।
 
Unable to bear the atrocities committed, the enraged Goddess Kali flashed her eyes and showed her fierce curved teeth (beard). Her red eyes started blazing and her figure became scary. She assumed a very terrifying form as if she was ready to destroy the whole universe. She jumped swiftly from the sacrificial altar and immediately cut off the heads of those thieves with the same sword with which they were going to kill Jad Bharat. Then she started drinking the hot blood flowing from the throats of those thieves with severed heads as if she was drinking wine (Asava). Actually she drank that liquor along with her followers, which included witches and witches, and then in a drunken state, they all started singing and dancing loudly as if they would destroy the whole universe. At the same time, she started playing with their heads by bouncing them like a ball.
तात्पर्य
इस श्लोक से यह स्पष्ट है कि देवी काली के भक्त बिल्कुल भी उसके पसंदीदा नहीं हैं। देवी काली का काम राक्षसों को मारना और सज़ा देना है। देवी काली (दुर्गा) समाज में कई राक्षसों, डाकुओं और अन्य अवांछित तत्वों का वध करती हैं। कृष्ण चेतना की उपेक्षा करते हुए, मूर्ख लोग देवी को कई घृणित चीजों की भेंट देकर संतुष्ट करने की कोशिश करते हैं, लेकिन अंततः जब इस पूजा में थोड़ी सी भी गड़बड़ी होती है, तो देवी पूजक को उसकी जान लेकर दंडित करती है। दैत्य लोग किसी भौतिक लाभ को प्राप्त करने के लिए देवी काली की पूजा करते हैं, लेकिन पूजा के नाम पर किए गए पापों को माफ नहीं किया जाता है। देवता के सामने किसी आदमी या जानवर की बलि देना विशेष रूप से मना किया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)