श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 9: जड़ भरत का सर्वोत्कृष्ट चरित्र  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  5.9.1-2 
श्रीशुक उवाच
अथ कस्यचिद् द्विजवरस्याङ्गिर:प्रवरस्य शमदमतप:स्वाध्यायाध्ययनत्याग
सन्तोषतितिक्षाप्रश्रयविद्यानसूयात्मज्ञानानन्दयुक्तस्यात्मसद‍ृशश्रुतशीलाचाररूपौदार्यगुणा नव सोदर्या अङ्गजा बभूवुर्मिथुनं च यवीयस्यां भार्यायाम् ॥ १ ॥
यस्तु तत्र पुमांस्तं परमभागवतं राजर्षिप्रवरं भरतमुत्सृष्टमृगशरीरं चरमशरीरेण विप्रत्वं गतमाहु: ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा, हे राजन्, हिरण का शरीर त्यागने के बाद भरत महाराज ने एक पवित्र ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया। वह ब्राह्मण अंगिरा वंश से सम्बन्धित था और ब्राह्मण के सभी गुणों से संपन्न था। वह अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखने वाला और वेदों और अन्य सहायक साहित्यों का ज्ञाता था। वह दान देने में कुशल था, और वह हमेशा संतुष्ट, सहनशील, विनम्र, विद्वान और ईर्ष्या रहित रहता था। वह आत्म-साक्षात्कारी था और भगवान की भक्ति सेवा में तत्पर रहता था। वह हमेशा ध्यानस्थ रहता था। उसकी पहली पत्नी से उसके समान ही योग्य नौ पुत्र हुए और दूसरी पत्नी से जुड़वाँ भाई-बहन पैदा हुए जिनमें से लड़का सर्वोच्च भक्त के नाम से जाना जाता था और ऋषि राजाओं में अग्रणी भरत महाराज के नाम से विख्यात हुआ। तो यह कथा है मृग शरीर को त्याग कर पुन: जन्म लेने की।
 
Srila Sukadeva Goswami continued, O King, after giving up the body of a deer, Bharata Maharaja was born in the family of a pure brahmana. That brahmana belonged to the Angira gotra and was endowed with all the qualities of a brahmana. He was in control of his mind and senses and knew the Vedic and other supplementary literature. He was charitable, contented, tolerant, modest, learned and never jealous of anyone. He was self-realized and always ready to serve the Lord. He was always in meditation. From his first wife, he had nine sons equally capable as himself and from his second wife, he had twin siblings, out of whom the boy became famous as Bharata Maharaja, the supreme devotee and foremost among the kings. So this is the story of his giving up the body of a deer and being born again.
तात्पर्य
भारत महाराज एक महान भक्त थे, लेकिन उन्हें एक जीवन में सफलता प्राप्त नहीं हुई। भगवद-गीता में कहा गया है कि एक भक्त जो अपने भक्ति कर्तव्यों को एक जीवन में पूरा नहीं करता है, उसे एक पूर्ण योग्य ब्राह्मण परिवार या एक अमीर क्षत्रिय या वैश्य परिवार में जन्म लेने का मौका दिया जाता है। शुचीनां श्रीमतां गेहे (भगवद गीता 6.41)। भारत महाराज एक अमीर क्षत्रिय परिवार में महाराज ऋषभ के ज्येष्ठ पुत्र थे, लेकिन अपने आध्यात्मिक कर्तव्यों की जानबूझकर उपेक्षा और एक तुच्छ हिरण के प्रति अत्यधिक लगाव के कारण, उन्हें एक हिरण के पुत्र के रूप में जन्म लेने के लिए बाध्य होना पड़ा था। हालाँकि, एक भक्त के रूप में उनकी दृढ़ स्थिति के कारण, उन्हें अपने पिछले जीवन की याद दिलाई गई थी। पश्चातापी होने के कारण, वह एक एकांत जंगल में रहे और हमेशा कृष्ण के बारे में सोचा करते थे। फिर उन्हें एक बहुत अच्छे ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने का मौका दिया गया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)