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bhagavat 5.8.4: प्राकृतिक रूप से मृगी को हमेशा दूसरों द्वारा मारे जाने का डर रहता था और लगातार शंकित दृष्टि से देख रही थी। जब उसने शेर की दहाड़ सुनी तो वह अत्यंत उद्विग्न हो उठी। चौकन्नी दृष्टि से इधर-उधर देखते हुए मृगी को पानी पीकर अभी पूरी तरह से तृप्त नहीं हुआ था कि अचानक उसने नदी को पार करने के लिए छलांग लगा दी।   |   bhagavat अध्याय 5.8: भरत महाराज के चरित्र का वर्णन   ।   bhagavat स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 8: भरत महाराज के चरित्र का वर्णन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.8.4 
तमुपश्रुत्य सा मृगवधू: प्रकृतिविक्लवा चकितनिरीक्षणा सुतरामपिहरिभयाभिनिवेशव्यग्रहृदया पारिप्लवद‍ृष्टिरगततृषा भयात् सहसैवोच्चक्राम ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
प्राकृतिक रूप से मृगी को हमेशा दूसरों द्वारा मारे जाने का डर रहता था और लगातार शंकित दृष्टि से देख रही थी। जब उसने शेर की दहाड़ सुनी तो वह अत्यंत उद्विग्न हो उठी। चौकन्नी दृष्टि से इधर-उधर देखते हुए मृगी को पानी पीकर अभी पूरी तरह से तृप्त नहीं हुआ था कि अचानक उसने नदी को पार करने के लिए छलांग लगा दी।
 
The deer was naturally afraid of being killed by others and was constantly looking around with suspicious eyes. When she heard the roar of the lion, she became very anxious. Looking around cautiously, the deer had not yet fully satiated herself by drinking water when suddenly she jumped to cross the river.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)