श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 8: भरत महाराज के चरित्र का वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.8.2 
तत्र तदा राजन् हरिणी पिपासया जलाशयाभ्याशमेकैवोपजगाम ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन्, जब महाराज भरत उस नदी के तट के पास आराम कर रहे थे, तभी तेज प्यास से व्याकुल एक हिरणी वहाँ पानी पीने के लिए आई।
 
O King, when King Bharata was sitting on the bank of that river, a thirsty deer came to drink water.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)