श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 7: राजा भरत कार्यकलाप  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  5.7.9 
यत्र ह वाव भगवान् हरिरद्यापि तत्रत्यानां निजजनानां वात्सल्येन सन्निधाप्यत इच्छारूपेण ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री हरि जी अपने भक्तों के साथ अपने दिव्य प्रेम और स्नेह के चलते पुलह आश्रम में प्रत्यक्ष होते हैं और उन सबकी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं।
 
भगवान श्री हरि जी अपने भक्तों के साथ अपने दिव्य प्रेम और स्नेह के चलते पुलह आश्रम में प्रत्यक्ष होते हैं और उन सबकी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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