श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 7: राजा भरत कार्यकलाप  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.7.6 
सम्प्रचरत्सु नानायागेषु विरचिताङ्गक्रियेष्वपूर्वं यत्तत्क्रियाफलं धर्माख्यं परे ब्रह्मणि यज्ञपुरुषे सर्वदेवतालिङ्गानां मन्त्राणामर्थनियामकतया साक्षात्कर्तरि परदेवतायां भगवति वासुदेव एव भावयमान आत्मनैपुण्यमृदितकषायो हवि:ष्वध्वर्युभिर्गृह्यमाणेषु स यजमानो यज्ञभाजो देवांस्तान् पुरुषावयवेष्वभ्यध्यायत् ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
विविध यज्ञों के प्रारंभिक कृत्यों को संपन्न करने के बाद, महाराज भरत यज्ञ के फल को धर्म के नाम से भगवान वासुदेव को समर्पित कर देते थे। दूसरे शब्दों में, वे भगवान वासुदेव कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए ही सभी यज्ञों का अनुष्ठान करते थे। महाराज भरत यह मानते थे कि देवतागण भगवान वासुदेव के शरीर के अंग हैं और वैदिक मंत्रों में बताए गए सभी देवता वासुदेव के नियंत्रण में हैं। इस प्रकार की सोच के परिणामस्वरूप, महाराज भरत आसक्ति, काम और लोभ जैसे भौतिक दूषणों से मुक्त थे। जब पुरोहित गण अग्नि में आहुतियाँ अर्पित करने जा रहे होते थे तो महाराज भरत यह समझ जाते थे कि भिन्न-भिन्न देवताओं को दी जाने वाली ये आहुतियाँ दरअसल भगवान के विभिन्न अंगों के निमित्त हैं। उदाहरण के लिए, इंद्र भगवान की भुजा हैं और सूर्य उनके नेत्र हैं। इस प्रकार, महाराज भरत ने सोचा कि भिन्न-भिन्न देवताओं को दी जाने वाली आहुतियाँ वास्तव में भगवान वासुदेव के विभिन्न अंगों के लिए हैं।
 
विविध यज्ञों के प्रारंभिक कृत्यों को संपन्न करने के बाद, महाराज भरत यज्ञ के फल को धर्म के नाम से भगवान वासुदेव को समर्पित कर देते थे। दूसरे शब्दों में, वे भगवान वासुदेव कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए ही सभी यज्ञों का अनुष्ठान करते थे। महाराज भरत यह मानते थे कि देवतागण भगवान वासुदेव के शरीर के अंग हैं और वैदिक मंत्रों में बताए गए सभी देवता वासुदेव के नियंत्रण में हैं। इस प्रकार की सोच के परिणामस्वरूप, महाराज भरत आसक्ति, काम और लोभ जैसे भौतिक दूषणों से मुक्त थे। जब पुरोहित गण अग्नि में आहुतियाँ अर्पित करने जा रहे होते थे तो महाराज भरत यह समझ जाते थे कि भिन्न-भिन्न देवताओं को दी जाने वाली ये आहुतियाँ दरअसल भगवान के विभिन्न अंगों के निमित्त हैं। उदाहरण के लिए, इंद्र भगवान की भुजा हैं और सूर्य उनके नेत्र हैं। इस प्रकार, महाराज भरत ने सोचा कि भिन्न-भिन्न देवताओं को दी जाने वाली आहुतियाँ वास्तव में भगवान वासुदेव के विभिन्न अंगों के लिए हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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