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श्लोक 5.7.14  |
परोरज: सवितुर्जातवेदो
देवस्य भर्गो मनसेदं जजान ।
सुरेतसाद: पुनराविश्य चष्टे
हंसं गृध्राणं नृषद्रिङ्गिरामिम: ॥ १४ ॥ |
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| अनुवाद |
| सम्पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विशुद्ध सत्ता में स्थित होते हैं। वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में आलोक फैलाते हैं और अपने भक्तों पर अनुग्रह करते हैं। भगवान ने अपने दिव्य तेज और शक्ति से ब्रह्माण्ड की रचना की है। अपनी इच्छा से वे इस ब्रह्माण्ड में परमात्मा के रूप में प्रविष्ट हुए और अपनी विभिन्न शक्तियों के द्वारा भौतिकता के आनंद की इच्छा रखने वाले सभी प्राणियों का पालन करते हैं। ऐसे बुद्धि देने वाले भगवान के प्रति मैं नमन करता हूँ। |
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| सम्पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विशुद्ध सत्ता में स्थित होते हैं। वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में आलोक फैलाते हैं और अपने भक्तों पर अनुग्रह करते हैं। भगवान ने अपने दिव्य तेज और शक्ति से ब्रह्माण्ड की रचना की है। अपनी इच्छा से वे इस ब्रह्माण्ड में परमात्मा के रूप में प्रविष्ट हुए और अपनी विभिन्न शक्तियों के द्वारा भौतिकता के आनंद की इच्छा रखने वाले सभी प्राणियों का पालन करते हैं। ऐसे बुद्धि देने वाले भगवान के प्रति मैं नमन करता हूँ। |
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| इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध पांच के अंतर्गत सातवाँ अध्याय समाप्त होता है । |
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