परमात्मा के रूप में, भगवान सभी जीवों के हृदय में प्रवेश करते हैं। जैसा कि ब्रह्म-संहिता (5.35) में कहा गया है, अण्डान्तर-स्थ-परमाणु-चयान्तर-स्थम्: "वह ब्रह्माण्ड और परमाणु में भी प्रवेश करता है।" ऋग्वेद में, सूर्य के अधिदेव को इस मंत्र द्वारा पूजा जाता है: ध्येयः सदा सवितृ-मण्डल-मध्य-वर्ती नारायणः सरसिजासन-सन्निविष्टः। नारायण सूर्य के भीतर अपने कमल के फूल पर बैठे हैं। इस मंत्र का पाठ करके, प्रत्येक जीव को नारायण की शरण लेनी चाहिए जैसे सूर्य उदय होता है। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार, भौतिक दुनिया सूर्य की चमक पर टिकी है। सूर्य के प्रकाश के कारण, सभी ग्रह घूम रहे हैं और सब्जियाँ उग रही हैं। हमारे पास यह जानकारी भी है कि चाँदनी सब्जियों और जड़ी-बूटियों को उगने में मदद करती है। वास्तव में सूर्य के भीतर नारायण पूरे ब्रह्मांड को बनाए हुए हैं; इसलिए नारायण की गायत्री मंत्र या ऋग मंत्र द्वारा पूजा की जानी चाहिए।
