श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 7: राजा भरत कार्यकलाप  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.7.14 
परोरज: सवितुर्जातवेदो
देवस्य भर्गो मनसेदं जजान ।
सुरेतसाद: पुनराविश्य चष्टे
हंसं गृध्राणं नृषद्रिङ्गिरामिम: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
सम्पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विशुद्ध सत्ता में स्थित होते हैं। वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में आलोक फैलाते हैं और अपने भक्तों पर अनुग्रह करते हैं। भगवान ने अपने दिव्य तेज और शक्ति से ब्रह्माण्ड की रचना की है। अपनी इच्छा से वे इस ब्रह्माण्ड में परमात्मा के रूप में प्रविष्ट हुए और अपनी विभिन्न शक्तियों के द्वारा भौतिकता के आनंद की इच्छा रखने वाले सभी प्राणियों का पालन करते हैं। ऐसे बुद्धि देने वाले भगवान के प्रति मैं नमन करता हूँ।
 
“The Supreme Personality of Godhead is situated in pure Sattva. He illuminates the entire universe and grants all benedictions to His devotees. The Lord created this universe with His transcendental effulgence. By His own will He entered this universe as the Supersoul and by His various energies He maintains all living entities who desire material happiness. I offer my obeisances to such an intelligent Lord.”
तात्पर्य
सूर्यता के अधिदेवता भी नारायण के ही एक विस्तार हैं, जो पूरे ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करते हैं। भगवान सभी जीवों के हृदय में परमात्मा के रूप में विराजते हैं, और उन्हें बुद्धि देते हैं और उनकी भौतिक कामनाओं को पूरा करते हैं। भगवद्-गीता में भी इसकी पुष्टि की गई है। सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः। "मैं सबके हृदय में विराजमान हूँ।" (भगवद्गीता। 15.15)

परमात्मा के रूप में, भगवान सभी जीवों के हृदय में प्रवेश करते हैं। जैसा कि ब्रह्म-संहिता (5.35) में कहा गया है, अण्डान्तर-स्थ-परमाणु-चयान्तर-स्थम्: "वह ब्रह्माण्ड और परमाणु में भी प्रवेश करता है।" ऋग्वेद में, सूर्य के अधिदेव को इस मंत्र द्वारा पूजा जाता है: ध्येयः सदा सवितृ-मण्डल-मध्य-वर्ती नारायणः सरसिजासन-सन्निविष्टः। नारायण सूर्य के भीतर अपने कमल के फूल पर बैठे हैं। इस मंत्र का पाठ करके, प्रत्येक जीव को नारायण की शरण लेनी चाहिए जैसे सूर्य उदय होता है। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार, भौतिक दुनिया सूर्य की चमक पर टिकी है। सूर्य के प्रकाश के कारण, सभी ग्रह घूम रहे हैं और सब्जियाँ उग रही हैं। हमारे पास यह जानकारी भी है कि चाँदनी सब्जियों और जड़ी-बूटियों को उगने में मदद करती है। वास्तव में सूर्य के भीतर नारायण पूरे ब्रह्मांड को बनाए हुए हैं; इसलिए नारायण की गायत्री मंत्र या ऋग मंत्र द्वारा पूजा की जानी चाहिए।

 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध पांच के अंतर्गत सातवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)