श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 7: राजा भरत कार्यकलाप  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  5.7.13 
इत्थं धृतभगवद्‌व्रत ऐणेयाजिनवाससानुसवनाभिषेकार्द्रकपिशकुटिलजटाकलापेन च विरोचमान: सूर्यर्चा भगवन्तं हिरण्मयं पुरुषमुज्जिहाने सूर्यमण्डलेऽभ्युपतिष्ठन्नेतदु होवाच ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
महाराज भरत बहुत ही सुंदर लग रहे थे। उनके सिर पर घुंघराले बालों की एक संपत्ति थी जो दिन में तीन बार नहाने से गीली थी। उन्होंने एक हिरण की खाल पहनी हुई थी और स्वर्णिम तेजोमय शरीर और सूर्य के भीतर रहने वाले श्री नारायण की पूजा की। उन्होंने ऋग्वेद के मंत्रों का जाप करते हुए भगवान नारायण की उपासना की और सूर्योदय होते ही निम्नलिखित श्लोक का पाठ किया।
 
Maharaja Bharata looked extremely handsome. He had a mass of curly hair on his head which was wet due to bathing three times a day. He wore deerskin and worshipped Shri Narayana who had a golden radiant body and resided within the sun. He worshipped Lord Narayana by chanting verses from the Rig Veda and recited the following verse as soon as the sun rose.
तात्पर्य
सूर्य के भीतर प्रधान देवता हिरण्मय, भगवान नारायण हैं। उनकी गायत्री मंत्र से पूजा की जाती है: ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। ऋग्वेद में उल्लिखित अन्य स्तोत्रों से भी उनकी पूजा की जाती है, उदाहरण के लिए: ध्येयः सदा सवितृ-मंडल-मध्य-वर्ती। सूर्य के भीतर भगवान नारायण स्थित हैं और वे सुनहरे रंग के हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)