तयेत्थमविरतपुरुषपरिचर्यया भगवति प्रवर्धमानानुरागभरद्रुतहृदयशैथिल्य: प्रहर्षवेगेनात्मन्युद्भिद्यमानरोमपुलककुलक औत्कण्ठ्यप्रवृत्तप्रणयबाष्पनिरुद्धावलोकनयन एवं निजरमणारुणचरणारविन्दानुध्यानपरिचितभक्तियोगेन परिप्लुतपरमाह्लादगम्भीरहृदयह्रदावगाढधिषणस्तामपि क्रियमाणां भगवत्सपर्यां न सस्मार ॥ १२ ॥
अनुवाद
इस प्रकार सर्वश्रेष्ठ भक्त महाराज भरत ईश्वर की भक्ति में निरन्तर लगे रहे। स्वाभाविक रूप से वासुदेव श्रीकृष्ण के प्रति उनका प्रेम बढ़ता गया और अन्तत: उनका हृदय द्रवित हो उठा। फलत: धीरे-धीरे समस्त विधि-विधानों के प्रति उनकी आसक्ति जाती रही। उन्हें रोमांच होने लगा और आह्लाद के सभी शारीरिक लक्षण (भाव) प्रकट होने लगे। उनके नेत्रों से अश्रुओं की अविरल धारा बहने लगी जिससे वे कुछ भी देखने में असमर्थ हो गये। इस प्रकार वे निरन्तर ईश्वर के अरुण चरणारविन्द पर ध्यान लगाये रहते। उस समय उनका सरोवर के सदृश हृदय आनन्द- जल से पूरित हो गया। जब उनका मन इस सरोवर में निमग्न हो गया तो वे नियमपूर्वक सम्पन्न की जाने वाली भगवद् पूजा भी भूल गये।
Thus, the greatest devotee Maharaja Bharata was constantly engaged in the devotion of God. Naturally, his love for Vasudeva Sri Krishna increased and eventually his heart melted. As a result, gradually his attachment to all rituals vanished. He started feeling thrilled and all the physical symptoms of joy started appearing. A continuous stream of tears started flowing from his eyes due to which he became unable to see anything. Thus he was constantly meditating on the red feet of God. At that time, his lake-like heart was filled with the water of joy. When his mind was immersed in this lake, he even forgot the worship of God which was to be performed regularly.
तात्पर्य
जब कोई वास्तव में कृष्ण के प्रति दिव्य प्रेम में उन्नत होता है, तो शरीर में आठ पारलौकिक, आनंदमय लक्षण प्रकट होते हैं। ये भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के प्रति प्रेममय सेवा से उत्पन्न पूर्णता के लक्षण हैं। चूँकि महाराज भरत लगातार भक्ति सेवा में लगे हुए थे, इसलिए भक्ति भाव के सभी लक्षण उनके शरीर में प्रकट थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥