सा वै पुंसां परो धर्मो
यतो भक्तिर अधोक्षजे
अहैतुकी अप्रतिहता
यायात्मा सुप्रसीदति
वासुदेवे भगवति
भक्ति-योगः प्रयोजितः
जनयत्याशु वैराग्यं
ज्ञानं च यद अहैतुकम्
“सभी मानवता के लिए सर्वोच्च व्यवसाय [धर्म] वह है जिसके द्वारा मनुष्य पारलौकिक भगवान के प्रति प्रेममय भक्ति सेवा प्राप्त कर सकते हैं। ऐसी भक्ति सेवा स्वतः को पूरी तरह से संतुष्ट करने के लिए अनुप्रेरित और निर्बाध होनी चाहिए। भगवान, श्री कृष्ण के व्यक्तित्व के प्रति भक्ति सेवा प्रदान करके, व्यक्ति तुरंत बिना किसी कारण के ज्ञान और दुनिया से अलगाव प्राप्त कर लेता है।” (भाग. १.२.६-७)
ये वो उपदेश हैं जो श्रीमद भागवतम में दिए गए हैं, जो सर्वोच्च वैदिक साहित्य है। हो सकता है कि कोई पुलहा-आश्रम न जा सके, लेकिन जहां भी कोई है वह ऊपर बताए गए उपायों को अपनाकर खुशी-खुशी प्रभु की भक्ति सेवा कर सकता है।
