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श्लोक 5.7.11  |
| तस्मिन् वाव किल स एकल: पुलहाश्रमोपवने विविधकुसुमकिसलयतुलसिकाम्बुभि: कन्दमूलफलोपहारैश्च समीहमानो भगवत आराधनं विविक्त उपरतविषयाभिलाष उपभृतोपशम: परां निर्वृतिमवाप ॥ ११ ॥ |
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| अनुवाद |
| पुलह आश्रम के उपवन में महाराज भरत अकेले रहकर नाना प्रकार के फूल, पत्ते और तुलसीदल इकट्ठे करने लगे। वे गंडकी नदी का पानी और नाना प्रकार के मूल, फल और कंद भी इकट्ठा करते। वे इन सभी से भगवान् वासुदेव को भोजन अर्पित करते और उनकी पूजा करते हुए संतुष्ट रहने लगे। इस प्रकार उनका हृदय अत्यंत शुद्ध हो गया और उन्हें भौतिक सुख के लिए तनिक भी इच्छा नहीं रही। उनकी समस्त भौतिक कामनाएँ दूर हो गईं। इस स्थिति में उन्हें परम संतोष हुआ और वे भक्ति में लगे रहे। |
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| पुलह आश्रम के उपवन में महाराज भरत अकेले रहकर नाना प्रकार के फूल, पत्ते और तुलसीदल इकट्ठे करने लगे। वे गंडकी नदी का पानी और नाना प्रकार के मूल, फल और कंद भी इकट्ठा करते। वे इन सभी से भगवान् वासुदेव को भोजन अर्पित करते और उनकी पूजा करते हुए संतुष्ट रहने लगे। इस प्रकार उनका हृदय अत्यंत शुद्ध हो गया और उन्हें भौतिक सुख के लिए तनिक भी इच्छा नहीं रही। उनकी समस्त भौतिक कामनाएँ दूर हो गईं। इस स्थिति में उन्हें परम संतोष हुआ और वे भक्ति में लगे रहे। |
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