शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को आगे बताया कि हे राजन्, कोंक, वेंक तथा कुटक के राजा ने, जिसका नाम अर्हत् था, ऋषभदेव के कार्य-कलापों के बारे में सुना और उसने ऋषभदेव के नियमों का अनुकरण करके एक नई धर्म-पद्धति शुरू कर दी। पापमय कर्मों के इस युग, कलियुग, का लाभ उठाकर मोहवश राजा अर्हत ने बाधारहित वैदिक नियमों को छोड़ दिया और वेदविरुद्ध एक नई धर्म-पद्धति बना ली। यही जैन धर्म का आरंभ था। अन्य कई तथाकथित धर्मों ने इस नास्तिकवाद को अपना लिया।
Sukadeva Goswami further told Maharaja Parikshit that O King, the king of Konka, Venka and Kutaka, whose name was Arhat, heard about the activities of Rishabhdev and started a new religious system by following the rules of Rishabhdev. Taking advantage of this age of sinful acts, Kaliyuga, King Arhat, in delusion, abandoned the unhindered Vedic rules and created a new religious system contrary to the Vedas. This was the beginning of Jainism. Many other so-called religions adopted this atheism.
तात्पर्य
जब भगवान श्री कृष्ण इस पृथ्वी पर उपस्थित थे, तो पौंड्रक नाम के एक व्यक्ति ने चार भुजा वाले नारायण की नक़ल करते हुए खुद को भगवान घोषित कर दिया। वह कृष्ण के साथ प्रतिस्पर्धा करना चाहता था। इसी तरह, भगवान ऋषभदेव के समय में, कोंक और वेणका के राजा ने एक परमहंस की तरह काम किया और भगवान ऋषभदेव की नकल की। उन्होंने एक धार्मिक प्रणाली शुरू की और कलियुग में लोगों की पतित अवस्था का फायदा उठाया। वैदिक साहित्य में कहा गया है कि इस युग में लोग किसी को भी भगवान मानने के लिए अधिक इच्छुक होंगे और वैदिक सिद्धांतों के विरुद्ध किसी भी धार्मिक प्रणाली को स्वीकार करेंगे। इस युग के लोगों को मंदः सुमंदमतायः के रूप में वर्णित किया गया है। सामान्यतः उनकी कोई आध्यात्मिक संस्कृति नहीं होती है, और इसलिए वे बहुत विकृत हैं। इसके कारण, वे किसी भी धार्मिक प्रणाली को स्वीकार करेंगे। दुर्भाग्य के कारण, वे वैदिक सिद्धांतों को भूल जाते हैं। इस युग में गैर-वैदिक सिद्धांतों का पालन करते हुए, वे खुद को भगवान मानते हैं और इस प्रकार पूरी दुनिया में नास्तिकता के पंथ का प्रसार करते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥