श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 6: भगवान् ऋषभदेव के कार्यकलाप  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  5.6.9 
यस्य किलानुचरितमुपाकर्ण्य कोङ्कवेङ्ककुटकानां राजार्हन्नामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणे भवितव्येन विमोहित: स्वधर्मपथमकुतोभयमपहाय कुपथपाखण्डमसमञ्जसं निजमनीषया मन्द: सम्प्रवर्तयिष्यते ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को आगे बताया कि हे राजन्, कोंक, वेंक तथा कुटक के राजा ने, जिसका नाम अर्हत् था, ऋषभदेव के कार्य-कलापों के बारे में सुना और उसने ऋषभदेव के नियमों का अनुकरण करके एक नई धर्म-पद्धति शुरू कर दी। पापमय कर्मों के इस युग, कलियुग, का लाभ उठाकर मोहवश राजा अर्हत ने बाधारहित वैदिक नियमों को छोड़ दिया और वेदविरुद्ध एक नई धर्म-पद्धति बना ली। यही जैन धर्म का आरंभ था। अन्य कई तथाकथित धर्मों ने इस नास्तिकवाद को अपना लिया।
 
शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को आगे बताया कि हे राजन्, कोंक, वेंक तथा कुटक के राजा ने, जिसका नाम अर्हत् था, ऋषभदेव के कार्य-कलापों के बारे में सुना और उसने ऋषभदेव के नियमों का अनुकरण करके एक नई धर्म-पद्धति शुरू कर दी। पापमय कर्मों के इस युग, कलियुग, का लाभ उठाकर मोहवश राजा अर्हत ने बाधारहित वैदिक नियमों को छोड़ दिया और वेदविरुद्ध एक नई धर्म-पद्धति बना ली। यही जैन धर्म का आरंभ था। अन्य कई तथाकथित धर्मों ने इस नास्तिकवाद को अपना लिया।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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