श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 6: भगवान् ऋषभदेव के कार्यकलाप  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.6.2 
ऋषिरुवाच
सत्यमुक्तं किन्‍त्विह वा एके न मनसोऽद्धा विश्रम्भमनवस्थानस्य शठकिरात इव सङ्गच्छन्ते ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया—हे राजन्, तुमने बिल्कुल ठीक कहा है। लेकिन जैसे शिकारी जानवरों को पकड़ने के बाद उन पर भरोसा नहीं करता क्योंकि वे भाग सकते हैं, उसी तरह, आध्यात्मिक जीवन में उन्नत लोग अपने मन पर भरोसा नहीं करते। दरअसल, वे हमेशा सचेत रहते हैं और मन की गतिविधियों पर नजर रखते हैं।
 
Srila Shukadeva Goswami replied, "O King, you have said the absolute truth. But just as a clever hunter does not trust animals after catching them because they can run away, in the same way great men do not trust their mind. In fact, they are always alert and keep an eye on the movements of the mind."
तात्पर्य
भगवद् गीता (18.5) में भगवान कृष्ण कहते हैं-

यज्ञ दान तपः कर्म

न त्याज्यं कार्यमेव तत्

यज्ञो दानं तपश्चैव

पावनानि मनीषिणाम्

'यज्ञ, दान और तप कर्मों को नहीं त्यागना चाहिए, बल्कि इन्हें करना ही चाहिए। निश्चित रूप से यज्ञ, दान और तप बड़े मनस्वियों को भी पवित्र करते हैं।'

संसार त्याग कर संन्यास धारण करने वाले व्यक्ति को भी हरे कृष्ण महामंत्र का जप नहीं त्यागना चाहिए। त्याग का अर्थ संकीर्तन-यज्ञ का त्याग करना नहीं है। उसी प्रकार दान या तपस्या का भी त्याग नहीं करना चाहिए। मन और इंद्रियों पर नियंत्रण के लिए योग प्रणाली का पालन अवश्य करना चाहिए। भगवान ऋषभदेव ने दिखाया कि किस प्रकार कठोर तप किए जा सकते हैं, और उन्होंने सबके लिए एक उदाहरण स्थापित किया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)