यज्ञ दान तपः कर्म
न त्याज्यं कार्यमेव तत्
यज्ञो दानं तपश्चैव
पावनानि मनीषिणाम्
'यज्ञ, दान और तप कर्मों को नहीं त्यागना चाहिए, बल्कि इन्हें करना ही चाहिए। निश्चित रूप से यज्ञ, दान और तप बड़े मनस्वियों को भी पवित्र करते हैं।'
संसार त्याग कर संन्यास धारण करने वाले व्यक्ति को भी हरे कृष्ण महामंत्र का जप नहीं त्यागना चाहिए। त्याग का अर्थ संकीर्तन-यज्ञ का त्याग करना नहीं है। उसी प्रकार दान या तपस्या का भी त्याग नहीं करना चाहिए। मन और इंद्रियों पर नियंत्रण के लिए योग प्रणाली का पालन अवश्य करना चाहिए। भगवान ऋषभदेव ने दिखाया कि किस प्रकार कठोर तप किए जा सकते हैं, और उन्होंने सबके लिए एक उदाहरण स्थापित किया।
