श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 6: भगवान् ऋषभदेव के कार्यकलाप  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  5.6.19 
नित्यानुभूतनिजलाभनिवृत्ततृष्ण:
श्रेयस्यतद्रचनया चिरसुप्तबुद्धे: ।
लोकस्य य: करुणयाभयमात्मलोक-
माख्यान्नमो भगवते ऋषभाय तस्मै ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान ऋषभदेव को अपनी वास्तविक पहचान का बोध था, इसलिए वे आत्मनिर्भर थे और उन्हें किसी बाहरी संतुष्टि की आवश्यकता नहीं थी। वे पूर्ण थे, इसलिए उन्हें किसी सफलता की कामना नहीं थी। जो लोग व्यर्थ में शरीर की भौतिक इच्छाओं में लिप्त रहते हैं और भौतिकता का माहौल बनाते हैं, वे अपने असली हित को नहीं पहचानते। भगवान ऋषभदेव ने दयालुता से वास्तविक बुद्धि और जीवन के लक्ष्य की शिक्षा दी। इसलिए हम भगवान ऋषभदेव को नमन करते हैं।
 
भगवान ऋषभदेव को अपनी वास्तविक पहचान का बोध था, इसलिए वे आत्मनिर्भर थे और उन्हें किसी बाहरी संतुष्टि की आवश्यकता नहीं थी। वे पूर्ण थे, इसलिए उन्हें किसी सफलता की कामना नहीं थी। जो लोग व्यर्थ में शरीर की भौतिक इच्छाओं में लिप्त रहते हैं और भौतिकता का माहौल बनाते हैं, वे अपने असली हित को नहीं पहचानते। भगवान ऋषभदेव ने दयालुता से वास्तविक बुद्धि और जीवन के लक्ष्य की शिक्षा दी। इसलिए हम भगवान ऋषभदेव को नमन करते हैं।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध पांच के अंतर्गत छठा अध्याय समाप्त होता है ।
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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