भगवान ऋषभदेव को अपनी वास्तविक पहचान का बोध था, इसलिए वे आत्मनिर्भर थे और उन्हें किसी बाहरी संतुष्टि की आवश्यकता नहीं थी। वे पूर्ण थे, इसलिए उन्हें किसी सफलता की कामना नहीं थी। जो लोग व्यर्थ में शरीर की भौतिक इच्छाओं में लिप्त रहते हैं और भौतिकता का माहौल बनाते हैं, वे अपने असली हित को नहीं पहचानते। भगवान ऋषभदेव ने दयालुता से वास्तविक बुद्धि और जीवन के लक्ष्य की शिक्षा दी। इसलिए हम भगवान ऋषभदेव को नमन करते हैं।
Lord Rishabhdev was aware of his true nature, so he was self-satisfied and he did not have any desire for external satisfaction. Being complete in himself, he did not desire any success. Those who are unnecessarily engaged in the body-soul consciousness and create an environment of materialism do not recognize their real interest. Lord Rishabhdev, out of causeless grace, taught the real self-consciousness and the goal of life. Therefore, we salute that Lord Rishabhdev.
तात्पर्य
यह अध्याय का सार है, जिसमें भगवान ऋषभदेव के कार्य का वर्णन किया गया है। भगवान ऋषभदेव स्वयं भगवान ही हैं, और उनमें पूर्णता है। हम जीव, भगवान के अंश हैं, हमें भगवान ऋषभदेव के निर्देशों का पालन करके आत्मनिर्भर बनना चाहिए। हमें शरीर के भ्रम की वजह से ज़्यादा ज़रूरतें नहीं बनानी चाहिए। जब व्यक्ति आत्मज्ञानी बन जाता है, तो वह अपनी मूल आध्यात्मिक अवस्था में स्थित होकर संतुष्ट रहता है। जैसा कि भगवद्गीता (18.54) में कहा गया है: ब्रह्म-भूतः प्रसन्न-आत्मा न शोचति न कांक्षति। यह सभी जीवों का लक्ष्य है। भले ही कोई इस भौतिक संसार में स्थित हो, फिर भी वह भगवद्गीता और श्रीमद भागवतम में भगवान के निर्देशों का पालन करके पूरी तरह संतुष्ट, सभी इच्छाओं और विलाप से विहीन हो सकता है। आत्मज्ञान से प्राप्त संतुष्टि को स्वरूपानंद कहते हैं। बंधी हुई आत्मा अंधकार में सोती रहती है, उसे अपने स्वार्थ का ज्ञान नहीं होता। वह केवल भौतिक समायोजन करके ही खुश होने का प्रयास करता है, लेकिन यह असंभव है। इसीलिए श्रीमद भागवतम में कहा गया है, न ते विदुः स्र्थ-गतियं हि विष्णुम्: अज्ञानता के कारण बंधी हुई आत्मा यह नहीं जानती कि उसका असली स्वार्थ भगवान विष्णु के चरण कमलों की शरण लेना है। भौतिक वातावरण को समायोजित करके खुश होने का प्रयास एक व्यर्थ प्रयास है। यह वास्तव में असंभव है। भगवान ऋषभदेव ने अपने व्यक्तिगत व्यवहार और निर्देश से बंधी हुई आत्मा को ज्ञान दिया और दिखाया कि कैसे वह अपनी आध्यात्मिक पहचान में आत्मनिर्भर बन सकता है।
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध पांच के अंतर्गत छठा अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥