श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 6: भगवान् ऋषभदेव के कार्यकलाप  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  5.6.18 
राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनां
दैवं प्रिय: कुलपति: क्‍व च किङ्करो व: ।
अस्त्वेवमङ्ग भगवान् भजतां मुकुन्दो
मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम् ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा- हे राजन्, परम पुरुष मुकुन्द पांडवों और यदुवंशियों के असली पालक हैं। वे तुम्हारे गुरु, पूजनीय आराध्य, मित्र और तुम्हारे कार्यों के निर्देशक हैं। इतना ही नहीं, वे कभी-कभी दूत या नौकर के रूप में भी तुम्हारे परिवार की सेवा करते हैं। इसका मतलब है कि उन्होंने सामान्य सेवकों की तरह ही काम किया। जो लोग ईश्वर की सेवा में लगे हुए हैं और उनके प्रिय पात्र बनना चाहते हैं, वे मुक्ति को आसानी से प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन वे बहुत कम लोगों को उनकी प्रत्यक्ष सेवा करने का अवसर प्रदान करते हैं।
 
Sukadeva Goswami further said—O King, the Supreme Person Mukunda is the real protector of all the Pandavas and the Yaduvanshis. He is your Guru, your deity, your friend and the director of your actions. Not only this, He sometimes serves your family as a messenger or a servant. This means that He acts like ordinary servants. Those who want to become a beloved by being engaged in the service of the Lord attain salvation easily, but He gives them very few opportunities to serve Him directly.
तात्पर्य
महाराजा परीक्षित का उपदेश करते हुए, शुकदेव गोस्वामी ने राजा को प्रोत्साहित करना बुद्धिमानी समझा क्योंकि राजा शायद विभिन्न शाही खानदानों की गौरवशाली स्थिति के बारे में सोच रहे थे। विशेष रूप से गौरवशाली प्रियव्रत का वंश है, जिसमें स्वयं भगवान ऋषभदेव अवतरित हुए। इसी तरह, महाराजा ध्रुव के पिता उत्तनापाद महाराज का परिवार भी राजा पृथु के इसमें जन्म लेने के कारण गौरवशाली है। महाराजा रघु का वंश गौरवशाली है क्योंकि भगवान रामचंद्र उस परिवार में प्रकट हुए थे। जहां तक यादव और कुरु वंशों का प्रश्न है, तो ये एक साथ ही अस्तित्व में थे, लेकिन दोनों में से यादव वंश भगवान कृष्ण के अवतरण के कारण अधिक गौरवशाली था। महाराजा परीक्षित सोच रहे होंगे कि कुरु वंश उतना भाग्यशाली नहीं था जितना कि दूसरे वंश, क्योंकि स्वयं भगवान उस परिवार में कृष्ण, भगवान रामचंद्र, भगवान ऋषभदेव या महाराजा पृथु के रूप में नहीं प्रकट हुए थे। इसलिए परीक्षित महाराज को शुकदेव गोस्वामी ने इस विशेष श्लोक में प्रोत्साहित किया। पाँचों पाण्डवों जैसे भक्तों की उपस्थिति के कारण कुरु वंश को अधिक गौरवशाली माना जा सकता है, जिन्होंने निष्छल भाव से भक्ति की। हालाँकि भगवान कृष्ण कुरु वंश में प्रकट नहीं हुए, लेकिन वे पाण्डवों की भक्ति से इतने ऋणी थे कि उन्होंने परिवार के पालनहार और पाण्डवों के आध्यात्मिक गुरु के रूप में कार्य किया। हालाँकि उनका जन्म यादव वंश में हुआ था, लेकिन भगवान कृष्ण पाण्डवों से अधिक स्नेह रखते थे। अपने कार्यों से, भगवान कृष्ण ने सिद्ध किया कि वह यादव वंश से अधिक कुरु वंश के प्रति झुकाव रखते थे। वास्तव में, पाण्डवों की भक्ति से ऋणी भगवान कृष्ण कभी-कभी उनके दूत के रूप में कार्य करते थे, और उन्होंने कई खतरनाक परिस्थितियों में उनका मार्गदर्शन किया। इसलिए महाराजा परीक्षित को दुखी नहीं होना चाहिए था क्योंकि भगवान कृष्ण उनके परिवार में प्रकट नहीं हुए थे। सर्वोच्च व्यक्ति ईश्वर हमेशा अपने शुद्ध भक्तों की ओर झुका रहता है, और उसकी क्रिया से यह स्पष्ट होता है कि भक्तों के लिए मुक्ति उतनी महत्वपूर्ण नहीं है। भगवान कृष्ण आसानी से किसी को मुक्ति दे देते हैं, लेकिन वे किसी को भक्त बनने की सुविधा आसानी से नहीं देते। मुक्ति ददति करिंचित сма न भक्ति योगम। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से यह प्रमाणित होता है कि भक्ति योग परमेश्वर के साथ परम संबंध का आधार है। यह मुक्ति से कहीं श्रेष्ठ है। भगवान के एक शुद्ध भक्त के लिए, मुक्ति अपने आप ही प्राप्त हो जाती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)