भक्त हमेशा अपने आप को भौतिक अस्तित्व के विभिन्न संघर्षों से मुक्त होने के लिए भक्ति सेवा में स्नान करते हैं। ऐसा करने से, भक्त परम आनंद का अनुभव करते हैं, और मुक्ति स्वयं उनकी सेवा करने आती है। फिर भी, वे उस सेवा को स्वीकार नहीं करते, भले ही वह स्वयं भगवान द्वारा ही क्यों न पेश की जाए। भक्तों के लिए, मुक्ति बहुत महत्वहीन है, क्योंकि प्रभु की पारलौकिक प्रेममयी सेवा प्राप्त करके, उन्होंने हर वांछित चीज प्राप्त कर ली है और सभी भौतिक इच्छाओं को पार कर लिया है।
Devotees bathe in the river of devotion in order to be free from the various troubles of the material world. This gives them supreme bliss and liberation itself comes to serve them. Yet they do not accept that service, even if the Lord Himself is ready to serve them. Liberation is unimportant to devotees, because after attaining the transcendental loving service of the Lord, all their desires are fulfilled and they have risen above all material desires.
तात्पर्य
भौतिक अस्तित्व की पीड़ा से मुक्ति की इच्छा रखने वालों के लिए ईश्वर की भक्ति में सेवा सर्वोच्च प्राप्ति है। जैसा कि भगवद्-गीता (6.22) में कहा है, यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः: "इसे प्राप्त करने के बाद कोई भी लाभ इससे बड़ा नहीं मानता।" जब कोई ईश्वर की सेवा प्राप्त कर लेता है, जो ईश्वर से भिन्न नहीं है, तो वह भौतिक चीज़ों की कामना नहीं करता। मुक्ति का अर्थ है भौतिक अस्तित्व से राहत। बिल्वमंगल ठाकुर कहते हैं: मुक्तिः मुकुलितांजलिः सेवातेऽस्मान। एक भक्त के लिए, मुक्ति कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है। मुक्ति का अर्थ है अपने संवैधानिक पद पर स्थित होना। प्रत्येक जीवित प्राणी की संवैधानिक स्थिति ईश्वर के सेवक की होती है; इसलिए जब एक जीवित प्राणी ईश्वर की प्रेममयी सेवा में लगा होता है, तो उसने पहले ही मुक्ति प्राप्त कर ली होती है। इसके परिणामस्वरूप एक भक्त मुक्ति की आकांक्षा नहीं करता, भले ही वह स्वयं परमेश्वर द्वारा प्रदान की जाए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥