श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 6: भगवान् ऋषभदेव के कार्यकलाप  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  5.6.16 
इति ह स्म सकलवेदलोकदेवब्राह्मणगवां परमगुरोर्भगवत ऋषभाख्यस्य विशुद्धाचरितमीरितं पुंसां समस्तदुश्चरिताभिहरणं परममहामङ्गलायनमिदमनुश्रद्धयोपचितयानुश‍ृणोत्याश्रावयति वावहितो भगवति तस्मिन् वासुदेव एकान्ततो भक्तिरनयोरपि समनुवर्तते ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा, "ऋषभदेव समस्त वैदिक ज्ञान, मनुष्यों, देवताओं, गायों और ब्राह्मणों के स्वामी हैं। मैंने पहले ही उनके शुद्ध, दिव्य कार्यों का वर्णन किया है, जो समस्त प्राणियों के पापों का नाश करेगा। भगवान ऋषभदेव की लीलाओं का यह वर्णन सभी शुभ चीजों का स्रोत है। जो कोई भी आचार्यों के अनुसरण में इन्हें ध्यान से सुनता या सुनाता है, उसे निश्चित रूप से भगवान वासुदेव, परम व्यक्तित्व के चरणों में अनन्य भक्ति प्राप्त होगी।"
 
शुकदेव गोस्वामी ने कहा, "ऋषभदेव समस्त वैदिक ज्ञान, मनुष्यों, देवताओं, गायों और ब्राह्मणों के स्वामी हैं। मैंने पहले ही उनके शुद्ध, दिव्य कार्यों का वर्णन किया है, जो समस्त प्राणियों के पापों का नाश करेगा। भगवान ऋषभदेव की लीलाओं का यह वर्णन सभी शुभ चीजों का स्रोत है। जो कोई भी आचार्यों के अनुसरण में इन्हें ध्यान से सुनता या सुनाता है, उसे निश्चित रूप से भगवान वासुदेव, परम व्यक्तित्व के चरणों में अनन्य भक्ति प्राप्त होगी।"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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