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श्लोक 5.6.15  |
को न्वस्य काष्ठामपरोऽनुगच्छे-
न्मनोरथेनाप्यभवस्य योगी ।
यो योगमाया: स्पृहयत्युदस्ता
ह्यसत्तया येन कृतप्रयत्ना: ॥ १५ ॥ |
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| अनुवाद |
| “ऐसा कौन योगी है जो मन से भी भगवान् ऋषभदेव के आदर्शों पर चल सकता है? उन्होंने उन सभी योग-सिद्धियों का त्याग कर दिया था जिनके लिए दूसरे योगी लालायित रहते हैं। भला ऐसा कौन योगी है जो भगवान् ऋषभदेव की तुलना कर सके?” |
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| “ऐसा कौन योगी है जो मन से भी भगवान् ऋषभदेव के आदर्शों पर चल सकता है? उन्होंने उन सभी योग-सिद्धियों का त्याग कर दिया था जिनके लिए दूसरे योगी लालायित रहते हैं। भला ऐसा कौन योगी है जो भगवान् ऋषभदेव की तुलना कर सके?” |
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