भारत-भूमिते हाइल मनुष्य-जनम यारा
जन्म सार्थक करि’ करा पर-उपकार
जैसा कि इस श्लोक में कहा गया है, भारत-वर्ष एक परम पवित्र भूमि है। वैदिक साहित्य के अनुयायी भगवान की विभिन्न अवतारों में समझ रखते हैं, और उन्हें वैदिक साहित्य के निर्देशों का पालन करके भगवान की महिमा करने का सौभाग्य प्राप्त है। मानव जीवन की महिमा को समझने के बाद, ऐसे लोगों को पूरे विश्व में मानव जीवन के महत्व को फैलाने का मिशन उठाना चाहिए। यही श्री चैतन्य महाप्रभु का मिशन है। अधिपुण्य शब्द इंगित करता है कि निश्चित रूप से दुनिया भर में कई अन्य पवित्र पुरुष हैं लेकिन भारत-वर्ष के लोग और भी अधिक पवित्र हैं। इसलिए वे समाज के लाभ के लिए पूरे विश्व में कृष्ण चेतना को फैलाने के लिए उपयुक्त हैं। श्रील माधवाचार्य भी भारत-वर्ष की भूमि को मान्यता देते हैं: विशेषाद भारत पुण्यम। पूरे विश्व में, भगवद-भक्ति या भक्ति सेवा का कोई प्रश्न नहीं है, लेकिन भारत-वर्ष के लोग भगवान की भक्ति सेवा को आसानी से समझ सकते हैं। इस प्रकार भारत-वर्ष का प्रत्येक निवासी भगवद-भक्ति का निर्वहन करके अपने जीवन को परिपूर्ण कर सकता है और फिर सभी के लाभ के लिए पूरे विश्व में इस पंथ का प्रचार कर सकता है।
