श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 6: भगवान् ऋषभदेव के कार्यकलाप  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  5.6.13 
तस्यानुगुणान् श्लोकान् गायन्ति—
अहो भुव: सप्तसमुद्रवत्या
द्वीपेषु वर्षेष्वधिपुण्यमेतत् ।
गायन्ति यत्रत्यजना मुरारे:
कर्माणि भद्राण्यवतारवन्ति ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
विद्वान लोग भगवान ऋषभदेव के दिव्य गुणों का इस तरह गुणगान करते हैं - "अरे! इस पृथ्वीलोक में सात समुद्र और कई द्वीप और देश हैं, जिनमें से भारतवर्ष सबसे पवित्र माना जाता है। इस भारतवर्ष के लोग भगवान के कार्यों, ऋषभदेव और अन्य कई अवतारों के रूप में उनकी महिमा का गुणगान करने के अभ्यस्त हैं। ये सभी कार्य मानवता के कल्याण के लिए अत्यंत शुभ हैं।"
 
Learned persons chant the transcendental qualities of Lord Rishabhadeva thus—“Oh! On this earth there are seven seas and numerous islands and years, of which Bharatavarsa is the most sacred. The people of Bharatavarsa are accustomed to sing praises of the activities of the Lord in the form of Rishabhadeva and in various other incarnations. All these activities are very auspicious for the welfare of mankind.”
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा:

भारत-भूमिते हाइल मनुष्य-जनम यारा

जन्म सार्थक करि’ करा पर-उपकार

जैसा कि इस श्लोक में कहा गया है, भारत-वर्ष एक परम पवित्र भूमि है। वैदिक साहित्य के अनुयायी भगवान की विभिन्न अवतारों में समझ रखते हैं, और उन्हें वैदिक साहित्य के निर्देशों का पालन करके भगवान की महिमा करने का सौभाग्य प्राप्त है। मानव जीवन की महिमा को समझने के बाद, ऐसे लोगों को पूरे विश्व में मानव जीवन के महत्व को फैलाने का मिशन उठाना चाहिए। यही श्री चैतन्य महाप्रभु का मिशन है। अधिपुण्य शब्द इंगित करता है कि निश्चित रूप से दुनिया भर में कई अन्य पवित्र पुरुष हैं लेकिन भारत-वर्ष के लोग और भी अधिक पवित्र हैं। इसलिए वे समाज के लाभ के लिए पूरे विश्व में कृष्ण चेतना को फैलाने के लिए उपयुक्त हैं। श्रील माधवाचार्य भी भारत-वर्ष की भूमि को मान्यता देते हैं: विशेषाद भारत पुण्यम। पूरे विश्व में, भगवद-भक्ति या भक्ति सेवा का कोई प्रश्न नहीं है, लेकिन भारत-वर्ष के लोग भगवान की भक्ति सेवा को आसानी से समझ सकते हैं। इस प्रकार भारत-वर्ष का प्रत्येक निवासी भगवद-भक्ति का निर्वहन करके अपने जीवन को परिपूर्ण कर सकता है और फिर सभी के लाभ के लिए पूरे विश्व में इस पंथ का प्रचार कर सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)