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श्लोक 5.6.1  |
राजोवाच
न नूनं भगव आत्मारामाणां योगसमीरितज्ञानावभर्जितकर्मबीजानामै
श्वर्याणि पुन: क्लेशदानि भवितुमर्हन्ति यदृच्छयोपगतानि ॥ १ ॥ |
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| अनुवाद |
| राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा - हे भगवन्, जो पूर्णरूपेण विमल हृदय हैं उन्हें भक्तियोग से ज्ञान प्राप्त होता है और कामनापूर्ति हेतु कर्म के प्रति आसक्ति पूर्णरूप से नष्ट हो जाती है। ऐसे व्यक्तियों में योग की शक्तियाँ स्वतः उत्पन्न होती हैं। इनसे किसी प्रकार का क्लेश उत्पन्न नहीं होता, तो फिर ऋषभदेव ने इन शक्तियों की उपेक्षा क्यों की? |
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| राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा - हे भगवन्, जो पूर्णरूपेण विमल हृदय हैं उन्हें भक्तियोग से ज्ञान प्राप्त होता है और कामनापूर्ति हेतु कर्म के प्रति आसक्ति पूर्णरूप से नष्ट हो जाती है। ऐसे व्यक्तियों में योग की शक्तियाँ स्वतः उत्पन्न होती हैं। इनसे किसी प्रकार का क्लेश उत्पन्न नहीं होता, तो फिर ऋषभदेव ने इन शक्तियों की उपेक्षा क्यों की? |
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