राजोवाच
न नूनं भगव आत्मारामाणां योगसमीरितज्ञानावभर्जितकर्मबीजानामै
श्वर्याणि पुन: क्लेशदानि भवितुमर्हन्ति यदृच्छयोपगतानि ॥ १ ॥
अनुवाद
राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा - हे भगवन्, जो पूर्णरूपेण विमल हृदय हैं उन्हें भक्तियोग से ज्ञान प्राप्त होता है और कामनापूर्ति हेतु कर्म के प्रति आसक्ति पूर्णरूप से नष्ट हो जाती है। ऐसे व्यक्तियों में योग की शक्तियाँ स्वतः उत्पन्न होती हैं। इनसे किसी प्रकार का क्लेश उत्पन्न नहीं होता, तो फिर ऋषभदेव ने इन शक्तियों की उपेक्षा क्यों की?
King Parikshit asked Shukdev Goswami—O Lord, those who are completely pure hearted attain knowledge through Bhaktiyoga and the attachment towards selfish actions burns to ashes. In such persons, yogic powers arise automatically. They do not cause any kind of suffering, then why did Rishabhdev ignore them?
तात्पर्य
एक सच्चा भक्त लगातार भगवान की सेवा में लगा रहता है। यज्ञ सेवा के निर्वहन के लिए जो भी जरूरी होता है वो अपने आप हासिल हो जाता है, भले ही ये किसी योगिक शक्ति का नतीज़ा लगे। कई बार योगी सोना बनाने जैसी छोटी-छोटी योगिक शक्तियां दिखाते हैं। ज़रा सा सोना दिखा कर वो मूर्ख लोगों को अपनी तरफ खींच लेते हैं और ऐसे ही योगियों के बहुत सारे अनुयायी बन जाते हैं जो उन्हें भगवान मानकर स्वीकार कर लेते हैं। ऐसे योगी खुद को भगवान भी कहलाते हैं। हालांकि, एक भक्त को ऐसे जादुई चमत्कार नहीं दिखाने पड़ते। बिना रहस्यमयी योग प्रक्रिया को अपनाए वो दुनिया भर में और भी ज़्यादा समृद्धि हासिल कर लेते हैं। ऐसे हालत में, भगवान ऋषभदेव ने रहस्यमयी योग की सिद्धियों को प्रदर्शित करने से मना कर दिया, और महाराज परीक्षित ने पूछा कि वो उन्हें क्यों नहीं स्वीकार करते, क्योंकि एक भक्त के लिए वो बिल्कुल भी परेशान करने वाली नहीं होती। एक भक्त कभी भी भौतिक संपन्नता से दुखी या संतुष्ट नहीं होता। उसकी चिंता सिर्फ ये होती है कि भगवान को कैसे प्रसन्न किया जाए। अगर भगवान की कृपा से एक भक्त ज़्यादा संपन्न हो जाता है तो वो उस मौके का इस्तेमाल भगवान की सेवा के लिए करता है। वो अपनी संपन्नता के साथ परेशान नहीं होता।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥