श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 4: भगवान् ऋषभदेव के लक्षण  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  5.4.8 
अथ ह भगवानृषभदेव: स्ववर्षं कर्मक्षेत्रमनुमन्यमान: प्रदर्शितगुरुकुलवासो लब्धवरैर्गुरुभिरनुज्ञातो गृहमेधिनां धर्माननुशिक्षमाणो जयन्त्यामिन्द्रदत्तायामुभयलक्षणं कर्म समाम्नायाम्नातमभियुञ्जन्नात्मजानामात्मसमानानां शतं जनयामास ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
महाराज नाभि के बदरिकाश्रम प्रस्थान करने पर सर्वोच्च ईश्वर ऋषभदेव ने अपने राज्य को अपना कर्मक्षेत्र माना। उन्होंने सबसे पहले गुरुओं के मार्गदर्शन में ब्रह्मचर्य स्वीकार करके इसका उदाहरण प्रस्तुत किया और गृहस्थ के कर्तव्यों की शिक्षा दी। इसके बाद वे गुरुकुल में रहने चले गए। शिक्षा पूरी होने के बाद उन्होंने गुरु-दक्षिणा दी और फिर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया। उन्होंने जयन्ती नामक पत्नी से विवाह किया और उनके एक सौ पुत्र हुए जो उनके समान ही बलवान और योग्य थे। उनकी पत्नी जयन्ती को स्वर्ग के राजा इन्द्र ने उन्हें भेंट किया था। ऋषभदेव और जयन्ती ने श्रुति और स्मृति शास्त्रों में बताए गए अनुष्ठानों का पालन करते हुए गृहस्थ जीवन का आदर्श प्रस्तुत किया।
 
After Maharaj Nabhi left for Badarikashram, Param Ish Rishabhdev considered his kingdom as his field of work. Hence, first of all, he accepted celibacy under the guidance of his Gurus and taught the duties of a householder by setting an example. He also went to live in a Gurukul. After completing his education, he gave Guru-Dakshina and then entered the householder stage. He took a wife named Jayanti and produced a hundred sons from her who were as strong and capable as him. His wife Jayanti was gifted to him by the King of Heaven Indra. Rishabhdev and Jayanti presented the ideal of a householder's life by following the rituals prescribed by the Shruti and Smriti scriptures.
तात्पर्य
भगवान के अवतार के रूप में, ऋषभदेव का भौतिक मामलों से कोई लेना देना नहीं था। जैसा कि भगवद-गीता में कहा गया है, परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृतां: अवतार का उद्देश्य भक्तों को मुक्त करना और अधर्मी गतिविधियों को रोकना है। अवतार लेने पर सर्वोच्च भगवान के ये दो कार्य हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा है कि उपदेश देने के लिए व्यक्ति को व्यावहारिक जीवन जीना चाहिए और लोगों को काम करने का तरीका दिखाना चाहिए। आपनी आचरि भक्ति, शिक्षामु सबारे। जब तक वह खुद उसी तरह व्यवहार नहीं करता तब तक वह दूसरों को शिक्षा नहीं दे सकता। ऋषभदेव एक आदर्श राजा थे, और उन्होंने गुरुकुल में अपनी शिक्षा ली, हालाँकि वह पहले से ही शिक्षित थे क्योंकि सर्वोच्च भगवान सर्वज्ञ हैं। यद्यपि ऋषभदेव को गुरुकुल से कुछ भी सीखने की जरूरत नहीं थी, लेकिन वह वहां सिर्फ लोगों को यह सिखाने के लिए गए थे कि सही स्रोत से शिक्षा कैसे प्राप्त करें, वैदिक अध्यापकों से। इसके बाद उन्होंने गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया और वैदिक ज्ञान - श्रुति और स्मृति के सिद्धांतों के अनुसार जीवन व्यतीत किया। श्रील रूप गोस्वामी ने अपने भक्ति-रसामृत-सिंधु (1.2.101) में स्कंद पुराण का उल्लेख करते हुए कहा है:

**श्रुति-स्मृति-पुराणादि

पंचरात्रा-विधिं विना

एकांतिकी हरि भक्ती

उत्पातायैव कल्पते**

मानव समाज को श्रुति और स्मृति, वैदिक साहित्य से प्राप्त निर्देशों का पालन करना चाहिए। व्यावहारिक रूप से जीवन में लागू यह पंचरात्रिका-विधि के अनुसार भगवान की सर्वोच्च व्यक्तित्व की पूजा है। हर मनुष्य को अपने आध्यात्मिक जीवन को आगे बढ़ाना चाहिए और अंत में घर वापस, भगवान के पास लौटना चाहिए। महाराज ऋषभदेव ने इन सभी सिद्धांतों का सख्ती से पालन किया। वह एक आदर्श गृहस्थ बने रहे और अपने पुत्रों को सिखाया कि कैसे आध्यात्मिक जीवन में पूर्ण बनना है। ये कुछ उदाहरण हैं कि कैसे उन्होंने पृथ्वी पर शासन किया और अवतार के रूप में अपना मिशन पूरा किया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)