श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 4: भगवान् ऋषभदेव के लक्षण  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.4.7 
ब्रह्मण्योऽन्य: कुतो नाभेर्विप्रा मङ्गलपूजिता: ।
यस्य बर्हिषि यज्ञेशं दर्शयामासुरोजसा ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
[दूसरी स्तुति इस प्रकार है] “महाराज नाभि से बढक़र ब्राह्मणों का उपासक (भक्त) कौन हो सकता है? उन्होंने योग्य ब्राह्मणों को पूजा से पूर्णतया सन्तुष्ट कर दिया। इसलिए, अपने ब्राह्मण तेज से उन्होंने महाराज नाभि को साक्षात नारायण भगवान को दिखाया।”
 
[The second stuti is as follows] "Who can be a greater worshipper (devotee) of brahmanas than Maharaja Nabhi? Since the king had completely satisfied the deserving brahmanas with worship, therefore by his brahma-tejas he made Maharaja Nabhi see Lord Narayana face to face."
तात्पर्य
बलिवै में ब्राह्मण के रूप में नियुक्त ब्राह्मण साधारण ब्राह्मण नहीं थे। वे इतने शक्तिशाली थे कि वे अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा भगवान श्रीहरि को बुला सकते थे। इस प्रकार महाराज नाभि प्रभु को आमने-सामने देख पाए। जब तक कोई वैष्णव नहीं हो जाता, वह भगवान श्रीहरि को नहीं बुला सकता। वैष्णव होने पर ही प्रभु निमंत्रण स्वीकार करते हैं। इसलिए पद्म पुराण में कहा गया है:

षट्-कर्म-निपुणो विप्रो

मंत्र-तंत्र-विशारदः।

अवैष्णवो गुरु न स्याद्

वैष्णवः श्व-पचो गुरुः।।

"वैष्णव न होकर, विद्या के सभी विषयों में पारंगत एक विद्वान ब्राह्मण गुरु बनने के अयोग्य है, लेकिन निम्न कुल में जन्मा व्यक्ति भी यदि वैष्णव हो जाए तो गुरु बन सकता है।" ये ब्राह्मण निश्चित रूप से वैदिक मंत्रों के उच्चारण में निपुण थे। वे वैदिक अनुष्ठान के निष्पादन में भी सक्षम थे, और इन सबके अतिरिक्त वे वैष्णव भी थे। इसलिए अपनी आध्यात्मिक शक्तियों के द्वारा वे भगवान श्रीहरि को आमंत्रित कर पाए और अपने शिष्य, महाराज नाभि को प्रभु को आमने-सामने देखने में सक्षम बनाया। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर टिप्पणी करते हैं कि ओजसा शब्द का अर्थ है "भक्ति सेवा के बल पर"।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)