षट्-कर्म-निपुणो विप्रो
मंत्र-तंत्र-विशारदः।
अवैष्णवो गुरु न स्याद्
वैष्णवः श्व-पचो गुरुः।।
"वैष्णव न होकर, विद्या के सभी विषयों में पारंगत एक विद्वान ब्राह्मण गुरु बनने के अयोग्य है, लेकिन निम्न कुल में जन्मा व्यक्ति भी यदि वैष्णव हो जाए तो गुरु बन सकता है।" ये ब्राह्मण निश्चित रूप से वैदिक मंत्रों के उच्चारण में निपुण थे। वे वैदिक अनुष्ठान के निष्पादन में भी सक्षम थे, और इन सबके अतिरिक्त वे वैष्णव भी थे। इसलिए अपनी आध्यात्मिक शक्तियों के द्वारा वे भगवान श्रीहरि को आमंत्रित कर पाए और अपने शिष्य, महाराज नाभि को प्रभु को आमने-सामने देखने में सक्षम बनाया। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर टिप्पणी करते हैं कि ओजसा शब्द का अर्थ है "भक्ति सेवा के बल पर"।
