यस्य ह पाण्डवेय श्लोकावुदाहरन्ति—
को नु तत्कर्म राजर्षेर्नाभेरन्वाचरेत्पुमान् ।
अपत्यतामगाद्यस्य हरि: शुद्धेन कर्मणा ॥ ६ ॥
अनुवाद
हे महाराज परीक्षित, महाराज नाभि की प्रशंसा में प्राचीन ऋषियों ने दो श्लोक रचे थे। उनमें से एक यह है, “महाराज नाभि के समान सिद्धि और कौन प्राप्त कर सकता है? उनके कार्यों की बराबरी कौन कर सकता है? उनकी भक्ति के कारण भगवान् ने स्वयं उनका पुत्र होना स्वीकार किया था।”
O Maharaja Pariksit, the ancient sages composed two verses in praise of Maharaja Nabhi. One of them is, “Who else can attain the perfection of Maharaja Nabhi? Who can reach his deeds? Because of his devotion, the Lord agreed to become his son.”
तात्पर्य
इस श्लोक में 'शुद्धेना कर्मणा' शब्द महत्वपूर्ण हैं। यदि कार्य भक्ति-सेवा में नहीं किया जाता है, तो वह भौतिक प्रकृति के गुणों से दूषित हो जाता है। इसे भगवद गीता में समझाया गया है: यज्ञार्थत कर्मणो'न्यत्र लोको'यम कर्म-बन्धन। केवल भगवान को संतुष्ट करने के लिए किए गए कार्य शुद्ध होते हैं और भौतिक प्रकृति के गुणों से दूषित नहीं होते हैं। अन्य सभी कार्य अज्ञान, कामना और गुण - तीनों से दूषित होते हैं। इंद्रियों को संतुष्ट करने वाले सभी भौतिक कार्य दूषित होते हैं, और महाराज नाभि ने कुछ भी दूषित कार्य नहीं किया था। यज्ञ करते समय भी, उन्होंने केवल अपनी पारलौकिक गतिविधियों का ही संचालन किया। परिणामस्वरूप उन्हें सर्वोच्च भगवान पुत्र के रूप में प्राप्त हुए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥