श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 4: भगवान् ऋषभदेव के लक्षण  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.4.3 
यस्य हीन्द्र: स्पर्धमानो भगवान् वर्षे न ववर्ष तदवधार्य भगवानृषभदेवो योगेश्वर: प्रहस्यात्मयोगमायया स्ववर्षमजनाभं नामाभ्यवर्षत् ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
स्वर्ग के राजा इंद्र, जो भौतिक रूप से बहुत ऐश्वर्यशाली थे, राजा ऋषभदेव से ईर्ष्या करने लगे। परिणामस्वरूप, उसने भारतवर्ष नामक ग्रह पर पानी बरसाना बंद कर दिया। उस समय, सभी योगों के स्वामी भगवान ऋषभदेव ने इंद्र के उद्देश्य को समझा और थोड़ा मुस्कुराए। तब, अपने शौर्य और योगमाया (उनकी आंतरिक शक्ति) से, उन्होंने अपने देश में, जिसे अजनाभ के नाम से जाना जाता था, भारी वर्षा की।
 
Indra, the king of heaven, who was materially very prosperous, became jealous of King Rishabhdev. So he stopped raining on the world called Bharatvarsha. At that time, Lord Rishabhdev, the master of all yogas, understood Indra's intention and smiled a little. Then, with his bravery and Yogmaya, he rained heavily in his country known as Ajnaabh.
तात्पर्य
इस श्लोक में हम भगवान शब्द का प्रयोग दो बार पाते हैं। सर्वोच्च भगवान के अवतार ऋषभदेव और राजा इंद्र दोनों को भगवान के रूप में वर्णित किया गया है। कभी-कभी नारद और भगवान ब्रह्मा को भी भगवान कहकर संबोधित किया जाता है। भगवान शब्द का अर्थ होता है कि व्यक्ति भगवान ब्रह्मा, भगवान शिव, नारद या इंद्र जैसे बहुत ही ऐश्वर्यशाली और पराक्रमी व्यक्ति होते हैं। वे सभी को उनके असाधारण ऐश्वर्य के कारण भगवान कहकर संबोधित किया जाता है। राजा ऋषभदेव सर्वोच्च भगवान के अवतार हैं और इसलिए, वह मूल भगवान हैं। इसके परिणामस्वरूप उन्हें यहां योगेश्वर के रूप में वर्णित किया गया है जो यह इंगित करता है कि उनके पास सबसे शक्तिशाली आध्यात्मिक क्षमता है। वे जल के लिए राजा इंद्र पर निर्भर नहीं हैं। वे स्वयं ही जल की आपूर्ति कर सकते हैं और उन्होंने इस मामले में भी ऐसा ही किया। भगवद्गीता में कहा गया है: यज्ञाद् भवति पर्जन्यः। यज्ञ के संपादन के कारण आकाश में जल के बादल बनते हैं। बादल और वर्षा स्वर्ग के राजा इंद्र के प्रबंधन में हैं परंतु जब इंद्र लापरवाही बरतते हैं तो स्वयं सर्वोच्च प्रभु जो यज्ञ या यज्ञ-पति के रूप में भी जाने जाते हैं, यह कार्य स्वयं अपने ऊपर ले लेते हैं। इसके परिणामस्वरूप अजनाभ नामक स्थान पर पर्याप्त वर्षा हुई। जब यज्ञपति चाहें तो वह बिना किसी अधीनस्थ की सहायता के कुछ भी कर सकते हैं। इसलिए सर्वोच्च भगवान को सर्वशक्तिमान के रूप में जाना जाता है। कलियुग वर्तमान में ऐसे समय में है अंततः जल की भारी कमी (अनावृष्टि) होने वाली है, सामान्य जनसंख्या के लिए, अज्ञानता और यज्ञात्मक तत्वों के अभाव के कारण, यज्ञ के संपादन में लापरवाही बरतेंगे। इसलिए श्रीमद् भागवत सलाह देता है: यज्ञैः संकीर्तन-प्रायैः यजन्ति हि सुमेधसः। आखिरकार यज्ञ सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान को संतुष्ट करने के लिए ही होता है। कलियुग जैसे वर्तमान समय में बहुत ही अभाव और अज्ञानता है; फिर भी, हर कोई संकीर्तन-यज्ञ कर सकता है। हर समाज में हर परिवार कम से कम हर शाम संकीर्तन-यज्ञ का आयोजन कर सकता है। इस तरह बारिश की कोई गड़बड़ी या कमी नहीं होगी। भौतिक रूप से खुश रहने के लिए और आध्यात्मिक रूप से प्रगति करने के लिए इस युग के लोगों के लिए संकीर्तन-यज्ञ करना आवश्यक है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)