श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 4: भगवान् ऋषभदेव के लक्षण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.4.2 
तस्य ह वा इत्थं वर्ष्मणा वरीयसा बृहच्छ्‌लोकेन चौजसा बलेन श्रिया यशसा वीर्यशौर्याभ्यां च पिता ऋषभ इतीदं नाम चकार ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
जब महाराज नाभि के पुत्र का जन्म हुआ, तो उसमें सभी अच्छे गुण थे जो महान कवियों ने वर्णित किए हैं - जैसे कि एक सुडौल शरीर जिसमें ईश्वर के लक्षण, शक्ति, बल, सुंदरता, नाम, यश, प्रभाव और उत्साह था। जब पिता महाराज नाभि ने ये सभी गुण देखे, तो उन्होंने सोचा कि उनका पुत्र मनुष्यों में सबसे श्रेष्ठ है या सर्वोच्च व्यक्ति है। इसलिए उन्होंने उसका नाम ऋषभ रखा।
 
When Maharaja Nabhi's son was born, he had all the good qualities described by the great poets such as a well-built body with the characteristics of God, bravery, strength, beauty, name, fame, influence and enthusiasm. When his father Maharaja Nabhi saw all these qualities, he considered him the best or the greatest person among humans and named him Rishabh.
तात्पर्य
किसी को भगवान या भगवान के अवतार के रूप में स्वीकार करने के लिए, किसी को उसके शरीर में भगवान के लक्षणों को देखना होगा। महाराजा नाभि के असाधारण रूप से शक्तिशाली पुत्र के शरीर में सभी लक्षण पाए गए थे। उनका शरीर भली-भाँति संरचित था, और उन्होंने सभी आध्यात्मिक गुणों का प्रदर्शन किया। उन्होंने महान प्रभाव दिखाया, और वह अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित कर सकते थे। इसलिए उनका नाम ऋषभ रखा गया, जो इंगित करता है कि वह सर्वोच्च जीवित प्राणी थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)