श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 4: भगवान् ऋषभदेव के लक्षण  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  5.4.19 
स कदाचिदटमानो भगवानृषभो ब्रह्मावर्तगतो ब्रह्मर्षिप्रवरसभायां प्रजानां निशामयन्तीनामात्मजानवहितात्मन: प्रश्रयप्रणयभरसुयन्त्रितानप्युपशिक्षयन्निति होवाच ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
एक बार भगवान ऋषभदेव दुनिया भर में भ्रमण करते हुए ब्रह्मावर्त नामक स्थान पर पहुंचे। वहाँ विद्वान ब्राह्मणों का एक बड़ा सम्मेलन हो रहा था और राजा के सभी पुत्र बहुत ध्यान से ब्राह्मणों का उपदेश सुन रहे थे। उस सभा में, सभी नागरिकों के सामने, ऋषभदेव ने अपने पुत्रों को शिक्षा दी, हालाँकि वे पहले से ही बहुत अच्छे व्यवहार वाले, भक्त और योग्य थे। उन्होंने उन्हें इसलिए शिक्षा दी ताकि वे भविष्य में दुनिया पर बहुत अच्छी तरह से शासन कर सकें। उन्होंने इस प्रकार कहा।
 
Once Lord Rishabhdev while wandering reached a country called Brahmavarta. There a big assembly of learned Brahmins was being held and all the sons of the king were listening to the teachings of the Brahmins with great attention. In that assembly, in front of all the citizens, Rishabhdev taught his sons, although they were already of good conduct, devotees and capable. He taught them so that they could rule the world well in the future. He spoke as follows.
तात्पर्य
यदि कोई इस संसार में, जो दुखों से भरा पड़ा है, शांतिपूर्वक रहना चाहे, तो उसके लिए भगवान ऋषभदेव द्वारा अपने पुत्रों को दिए हुए निर्देश अत्यंत मूल्यवान हैं। अगले अध्याय में भगवान ऋषभदेव ने अपने पुत्रों को ये मूल्यवान निर्देश दिए हैं।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध पांच के अंतर्गत चौथा अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)