भगवतर्षभेण परिरक्ष्यमाण एतस्मिन् वर्षे न कश्चन पुरुषो वाञ्छत्यविद्यमानमिवात्मनोऽन्यस्मात्कथञ्चन किमपि कर्हिचिदवेक्षते भर्तर्यनुसवनं विजृम्भितस्नेहातिशयमन्तरेण ॥ १८ ॥
अनुवाद
कोई भी व्यक्ति ‘आकाश-कुसुम’ जैसी वस्तु पाने की इच्छा नहीं करता क्योंकि उसे पता रहता है कि ऐसी वस्तुएँ विद्यमान नहीं हैं। जब भगवान ऋषभदेव ने इस भारतवर्ष-भूमि पर शासन किया था तो सामान्य लोग भी किसी समय या किसी प्रकार से किसी वस्तु की इच्छा नहीं रखते थे। कोई भी ‘आकाश कुसुम’ नहीं चाहता है। इसका मतलब यह है कि सभी लोग पूर्ण रूप से संतुष्ट थे इसलिए किसी को किसी भी प्रकार की वस्तु मांगने की आवश्यकता नहीं थी। सभी लोग राजा के असीम स्नेह में मग्न थे। क्योंकि यह स्नेह लगातार बढ़ता गया था इसलिए वे किसी भी वस्तु की याचना करने के इच्छुक नहीं थे।
Nobody desires to obtain something like 'sky-flower' because he knows that such things do not exist. When Lord Rishabhdev was ruling this land of Bharatvarsha, even the common people did not desire anything at any time or in any way. Nobody wants 'sky-flower'. What is meant to say is that everyone was completely satisfied, so there was no need for anyone to ask for anything. Everyone was immersed in the great affection of the king. Since this affection kept on increasing, they were not interested in begging for anything.
तात्पर्य
बंगाल में इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द "घोड़ा-डिम्बा" का अर्थ "घोड़े का अंडा" होता है। क्योंकि घोड़ा कभी अंडे नहीं देता, इसलिए शब्द घोड़ा-डिम्बा का कोई अर्थ नहीं होता। संस्कृत में एक शब्द "खा-पुष्प" है जिसका अर्थ है "आकाश में खिलने वाला फूल"। आकाश में कोई फूल नहीं उगता, इसलिए कोई भी खपुष्प या घोड़ा-डिम्बा के बारे में पूछने में इच्छुक नहीं होता। महाराज ऋषभदेव के शासनकाल में लोग इतने संपन्न थे कि वे किसी भी चीज की कामना नहीं करते थे। राजा ऋषभदेव के अच्छे शासन के कारण जीवन की सभी आवश्यकताओं की उन्हें भरपूर पूर्ति होती थी। परिणामस्वरूप हर कोई पूर्ण रूप से संतुष्ट था और उसे किसी चीज की जरूरत नहीं थी। यह एक उत्तम सरकार की निशानी है। यदि नागरिक बुरे शासन के कारण दुखी हैं तो सरकार के मुखिया को दोष दिया जाता है। लोकतंत्र के इस युग में लोगों को राजशाही खटकती है पर यहाँ हम देख सकते हैं कि पूरी दुनिया के सम्राट ने कैसे जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने और वैदिक सिद्धांतों का पालन करके अपने सभी नागरिकों को पूर्णतः संतुष्ट रखा। इस प्रकार महाराज ऋषभदेव के शासनकाल में सभी लोग खुश थे, जो ईश्वर के परम व्यक्तित्व हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥