द्रव्यदेशकालवय:श्रद्धर्त्विग्विविधोद्देशोपचितै: सर्वैरपि क्रतुभिर्यथोपदेशं शतकृत्व इयाज ॥ १७ ॥
अनुवाद
भगवान ऋषभदेव ने वेदों के निर्देशों के अनुसार सभी प्रकार के यज्ञों को सौ-सौ बार किया। इस प्रकार उन्होंने भगवान विष्णु को हर तरह से संतुष्ट किया। सभी अनुष्ठानों में सर्वोत्तम सामग्री का उपयोग किया गया। वे उचित समय पर और पवित्र स्थानों में युवा और श्रद्धालु पुरोहितों द्वारा किए गए। इस प्रकार भगवान विष्णु की पूजा की गई और प्रसाद सभी देवताओं को अर्पित किया गया। इसलिए सभी समारोह और त्योहार सफल रहे।
Lord Rishabhdev performed all the yagnas prescribed in the scriptures a hundred times and thus pleased Lord Vishnu in every way. All the rituals were performed with the best quality materials, at the right time and in holy places by young and devout priests. Thus Lord Vishnu was worshipped and prasad was distributed to all the gods. All the rituals and celebrations were successful.
तात्पर्य
कहा जाता है, कौमार आचरेत प्राज्ञो धर्मन् भगवतान इह (भाग. 7.6.1)। युवाओं, यहाँ तक कि बच्चों को भी, अनुष्ठान को सफलतापूर्वक करने के लिए निविदा उम्र में अनुष्ठान करना चाहिए। बचपन से, लोगों को वैदिक संस्कृति में, विशेषकर भक्ति सेवा में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इस तरह से, कोई व्यक्ति अपने जीवन को पूर्ण बना सकता है। एक वैष्णव देवताओं का अनादर नहीं करता है, लेकिन दूसरी ओर वह इतना मूर्ख भी नहीं होता कि वह प्रत्येक देवता को सर्वोच्च भगवान के रूप में स्वीकार करे। सर्वोच्च भगवान सभी देवताओं का स्वामी है; इसलिए देवता उनके सेवक हैं। वैष्णव उन्हें सर्वोच्च भगवान के सेवक के रूप में स्वीकार करते हैं, और वह सीधे उनकी पूजा करते हैं। ब्रह्म-संहिता में, महत्वपूर्ण देवताओं - भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा और यहां तक कि भगवान कृष्ण के अवतार और विस्तार जैसे महा-विष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु और अन्य सभी विष्णु-तत्व, साथ ही शक्ति-तत्व जैसे दुर्गा देवी - सभी गोविंद की पूजा करने की प्रक्रिया से पूजा की जाती है जिसमें गोविंदम आदि-पुरुषम तम अहं भजामी शब्द शामिल हैं। एक वैष्णव देवताओं की पूजा गोविंद के संबंध में करता है, स्वतंत्र रूप से नहीं। वैष्णव इतने मूर्ख नहीं हैं कि वे देवताओं को ईश्वर के व्यक्तित्व से स्वतंत्र मानते हैं। यह चैतन्य-चरितामृत में पुष्टि की गई है। एकले ईश्वर कृष्ण, आरा सब भृत्य: सर्वोच्च स्वामी कृष्ण हैं, और अन्य सभी उनके सेवक हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥